21वीं सदी का अंधविश्वास: चमोली में मासिक धर्म होने पर गाँव से दूर नहाने की परंपरा निभाने में गई सुमित्रा की जान
21वीं सदी के भारत ने तरक्की के सारे मुकाम हासिल किए हैं लेकिन देश में आज भी अंधविश्वास और रूढ़िवादी परम्पराओं की जड़ें समाप्त नहीं हुई हैं. चमोली जिले में गाँव की परंपरा कहें या अंधविश्वास को निभाने के चक्कर में एक 19 वर्षीय युवती की जान चली गई.जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
चमोली के नंदानगर ब्लॉक में मासिक धर्म के दौरान स्नान के लिए नदी किनारे गई युवती सुमित्रा का शव बरामद हुआ है. ग्रामीणों के मुताबिक महिलाओं को गांव की सीमा में स्नान की मनाही के चलते करीब 5 किलोमीटर दूर नदी तट पर जाना पड़ता है. घटना के बाद इस परंपरा को लेकर शोक और आक्रोश के साथ इसे खत्म करने की मांग उठ रही है.
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ये घटना उस दिन की है जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था लेकिन सुतोल-तातड़ा गाँव की महिलाएं आज भी गाँव की इस रूढ़िवादी परंपरा की जंजीरों की गुलाम हैं,यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि एक ऐसी कुप्रथा से जुड़ा मामला है जिसकी कल्पना इस दौर में करना भी मुश्किल है.
मासिक धर्म के दौरान गाँव की सीमा में स्नान करने पर रोक :
जानकारी के अनुसार ग्राम सभा सुतोल के तातड़ा तोक में भूमियाल देवता की पवित्र भूमि मानकर आज भी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान गांव की सीमा में स्नान करने की मनाही है. इसके लिए महिलाओं को तातड़ा गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर सुतोल गांव में नंदाकिनी नदी के किनारे जाना पड़ता है.
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बताया जा रहा है कि सुमित्रा भी 15 अगस्त को सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने के बाद शाम को स्नान के लिए 5 किमी दूर नदी तट पर गई थी और वहां उसके साथ हादसा हो गया. ग्रामीणों ने लगातार उसकी ढूंढ-खोज की और उसी दिन रात को उसकी चप्पल नदी में करीब 1 किलोमीटर दूर मिली थी. तभी से आशंका थी कि उसे नदी ने अपने आगोश में ले लिया है. शनिवार को उसके शव मिलने की पुष्टि हुई है.
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क्षेत्र में घटना को लेकर आक्रोश :
इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और आक्रोश है. स्थानीय लोगों का कहना है कि आज के समय में महिलाओं को 5 किमी दूर खुले और असुरक्षित स्थान पर स्नान के लिए मजबूर करना और रास्ते में मिलने वाले हर व्यक्ति को यह बताना कि वह मासिक धर्म में है, यह महिलाओं के लिए घोर प्रताड़ना है.
प्रथा समाप्त करने की उठी मांग :
क्षेत्र के जागरूक लोगों ने बुजुर्गों और युवाओं से अपील की है कि इष्ट देवता अपने भक्तों का अहित नहीं चाहते. किसी भी देवता की ऐसी मंशा नहीं होगी कि उसकी पूजा के नाम पर किसी बेटी की जान चली जाए. इसलिए इस अमानवीय प्रथा को अब बंद किया जाना चाहिए। पहाड़ों में मासिक धर्म के चलते महिलाओं को रसोई घर में प्रवेश करने नहीं दिया जाता ये तो अक्सर देखने और सुनने को मिलता है लेकिन चमोली की ये घटना अनोखी है।
जब सरकार जन-जागरूकता के इतने अभियान चलाती है. समाज शिक्षित हो चूका है तो चमोली के इस गाँव में आज भी ये रूढ़िवादी सोच क्यों है ये चिंता का विषय है।



















