MP: सच दिखाने पर बौखलाया ब्लैकमेलर, डॉक्टरों को फंसाने वाले मास्टरमाइंड ने मीडिया को भेजा मानहानि का नोटिस
पत्रकारिता के पवित्र नाम पर डॉक्टरों और नर्सिंग होम संचालकों को ब्लैकमेल कर लाखों रुपये ऐंठने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ होने के बाद, अब इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड विनय कुमार अरोड़ा कानूनी नोटिसों के पीछे छिपने की नाकाम कोशिश कर रहा है। मध्य प्रदेश की देवास पुलिस और कोर्ट के हत्थे चढ़ चुके इस आरोपी ने अपनी सच्चाई उजागर होने से बौखलाकर अब सच की आवाज दबाने के लिए 'मानहानि का दावा' ठोकने की धमकी दी है।
क्या है पूरा मामला? (ब्लैकमेलिंग का घिनौना धंधा) :
बीते दिनों मध्य प्रदेश के देवास में निजी डॉक्टरों को डरा-धमकाकर लाखों रुपये की अवैध वसूली करने वाले एक बेहद शातिर गिरोह का पर्दाफाश हुआ था। यह गिरोह इतना संगठित था कि इसकी महिला सदस्य (मरीज या नर्स बनकर) शहर के नामी डॉक्टरों के पास जाती थीं और उन पर गैर-कानूनी तरीके से गर्भपात (Abortion) करने या पेट में पल रहे बच्चे का लिंग टेस्ट करने का भारी दबाव बनाती थीं।
जब डॉक्टर उनसे बात कर रहे होते, तभी गिरोह के अन्य सदस्य गुप्त कैमरों (Hidden Cameras) से पूरी बातचीत की कांट-छांट कर फर्जी वीडियो तैयार कर लेते थे। इसके बाद खुद को राष्ट्रीय समाचार एजेंसी (PTI) या तहलका डॉट कॉम का प्रमुख बताने वाले पुरुष साथी डॉक्टरों को वह एडिटेड वीडियो दिखाकर जेल भिजवाने और अस्पताल सील कराने की धमकी देते थे।
इस गिरोह ने श्रीराम नर्सिंग होम से 15 लाख रुपये की रंगदारी मांगी थी और माहेश्वरी नर्सिंग होम के डॉक्टरों को डराकर 10 लाख रुपये नकद वसूल भी चुके थे।
कोर्ट ने कहा था— "यह संगठित अपराध है"
जब मुख्य आरोपी विनय अरोड़ा ने पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए कोर्ट में खुद को 'सच्चा और खोजी पत्रकार' बताते हुए बीमारी का हवाला देकर जमानत याचिका डाली, तो माननीय अदालत ने सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था, "यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि प्रेस के नाम पर किया जा रहा एक संगठित अपराध है।" सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल कॉल रिकॉर्ड्स ने इस पूरे गिरोह के काले कारनामों की पोल खोलकर रख दी थी।
अब 'उल्टे चोर कोतवाल को डांटे': मानहानि के नोटिस का ड्रामा :
जब हमने कोर्ट के आदेशों और पुलिस जांच के आधार पर इस महाठग गिरोह का सच जनता के सामने रखा, तो आरोपी विनय कुमार अरोड़ा ने अपने वकील के माध्यम से एक कानूनी नोटिस भेजा है। इस नोटिस में हैरान कर देने वाले दावे किए गए हैं:
'प्रतिष्ठा' धूमिल होने का दावा: नोटिस में कहा गया है कि खबरों के कारण समाज में विनय अरोड़ा की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। जबकि असलियत यह है कि समाज के रक्षकों (डॉक्टरों) को ब्लैकमेल करने वाले अपराधियों की कोई सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं होती।
खबरें हटाने की धमकी: नोटिस के जरिए चेतावनी दी गई है कि खबर से जुड़े सभी लिंक, फेसबुक पोस्ट और मीडिया ग्रुप्स से यह जानकारी 15 दिनों के भीतर हटा दी जाए, अन्यथा आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा। यह सीधे तौर पर स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने की कोशिश है।अगर ये ब्लैकमेलर सचमुच का पत्रकार होता तो जानता कि ख़बरें हटाने के दबाव पर कौनसी धाराएं लग सकती हैं।
10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग: जो व्यक्ति खुद डॉक्टरों से लाखों की रंगदारी वसूल रहा था, वह अब खुद को पीड़ित बताकर मीडिया से 10 लाख रुपये का हर्जाना मांग रहा है।
जनता की आवाज बनना कब से गुनाह हो गया ?
लोकतंत्र में मीडिया का काम समाज के सामने सच लाना है। जब कोई अपराधी खुद को पत्रकार बताकर कानून का मजाक उड़ाता है, तो उसका पर्दाफाश करना हर जागरूक नागरिक और संस्था का कर्तव्य है। कानूनी नोटिसों और गीदड़ भभकियों से सच की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका पूरी तरह से सच के साथ हैं और इस गिरोह के बाकी फरार सदस्यों की तलाश में लगातार छापेमारी कर रही है।
हमारा सभी पाठकों से निवेदन है कि ऐसे कथित पत्रकारों से दूरी सेहत के लिए फायदेमंद है,इनका पूरा कालाचिट्ठा नीचे संलग्न है :









