चमोली के तमक नाले में अचानक आया सैलाब, पहाड़ों के अलर्ट सिस्टम पर उठे सवाल
उत्तराखंड के चमोली जिले में तमक नाले में अचानक आए तेज सैलाब ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में आपदा से निपटने की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार को नाले का जलस्तर अचानक बढ़ गया और पानी के तेज बहाव की चपेट में आने से बेली पुल बह गया। घटना के कारण मलारी , जुम्मा और नीति क्षेत्र में आवाजाही प्रभावित हुई और स्थानीय लोगों के सामने परेशानी खड़ी हो गई।
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तमक नाला पहले भी भारी बारिश के दौरान उफान पर आ चुका है। पिछले साल भी तेज बारिश के कारण यहां बना पुल क्षतिग्रस्त होकर बह गया था। इससे नीती घाटी के कई गांवों और सीमावर्ती इलाकों का संपर्क प्रभावित हुआ था। लगातार दोहराती ऐसी घटनाओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और निगरानी व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ रही है।
यह बात समझना जरूरी है कि मौसम वैज्ञानिक किसी छोटे से इलाके में बादल फटने की घटना का बिल्कुल सटीक स्थान और समय पहले से बताने की स्थिति में नहीं होते। किसी खास जगह पर किस मिनट फ्लैश फ्लड आएगी या बादल फटेगा, इसका पूर्वानुमान लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। इसलिए हर ऐसी घटना से पहले सटीक चेतावनी जारी न हो पाना केवल प्रशासन की नाकामी नहीं कही जा सकती।
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मौसम विभाग और केंद्रीय एजेंसियों के पास भारी बारिश, बाढ़ और अन्य मौसम संबंधी खतरों की निगरानी के लिए विभिन्न प्रणालियां मौजूद हैं। मल्टी-हैजर्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम के माध्यम से संभावित प्राकृतिक खतरों की जानकारी और चेतावनी साझा की जाती है। वहीं, केंद्रीय जल आयोग भी चिन्हित क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति को लेकर पूर्वानुमान जारी करता है।
इसके साथ ही आसपास के गांवों, निर्माण स्थलों, बीआरओ कैंप और अन्य संवेदनशील स्थानों पर तत्काल सायरन बजने की व्यवस्था होनी चाहिए। मोबाइल फोन पर अलर्ट भेजना भी जरूरी है, लेकिन पहाड़ों में हर जगह मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की उपलब्धता समान नहीं है। कई बार आपदा के दौरान लोगों को बचने के लिए सिर्फ कुछ मिनट मिलते हैं। ऐसे में समय पर मिली चेतावनी किसी बड़ी दुर्घटना को टाल सकती है।
पिछले साल उत्तरकाशी में आई आपदा के बाद धराली और हर्षिल जैसे संवेदनशील इलाकों में अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की योजनाएं भी सामने आई थीं। कई स्थानों पर स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित करने की तैयारी की गई है। इन प्रयासों के बावजूद तमक नाले जैसी घटनाएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि क्या मौजूदा व्यवस्था राज्य के हर उस स्थान तक पहुंच चुकी है जहां अचानक फ्लैश फ्लड का खतरा बना रहता है।
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सरकार को संवेदनशील नालों और नदी घाटियों की विस्तृत पहचान कर वहां मौसम केंद्रों और रेन गेज का मजबूत नेटवर्क तैयार करना चाहिए। ज्यादा जोखिम वाले स्थानों पर ऑटोमेटिक सायरन और वाटर-लेवल अलर्ट सिस्टम अनिवार्य किए जा सकते हैं। साथ ही स्थानीय लोगों और नदी किनारे काम करने वाले कर्मचारियों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि अलर्ट मिलने के बाद उन्हें किस सुरक्षित स्थान की ओर जाना है। इसके लिए समय-समय पर मॉक ड्रिल भी कराई जानी चाहिए।
अर्ली वार्निंग सिस्टम तभी प्रभावी होगा जब लोग भी जारी चेतावनियों को गंभीरता से लें। मानसून के दौरान नदी, गदेरे और नालों के पास अनावश्यक रूप से रुकना या तेज बहाव को पार करने का प्रयास बेहद खतरनाक हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जलस्तर कुछ ही मिनटों में तेजी से बढ़ सकता है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मानसून के दौरान ऐसी घटनाओं का खतरा बना रहता है। तमक नाले की घटना यह याद दिलाती है कि केवल सड़क और पुलों को मजबूत करना पर्याप्त नहीं है। लोगों तक सही समय पर चेतावनी पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय से जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।



















