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प्यार हो तो ऐसा- जापान की महिला ने बागेश्वर में बहाई पति की अस्थियां, यहीं साथ बिताए थे यादगार लम्हे

किस्सों और कहानियों में प्यार की कई मिसालें दी जाती हैं आज ऐसी ही एक मिसाल जापान की महिला मियाको कैटलेट ने कायम की. जो अपने पति की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए जापान से उत्तराखंड के बागेश्वर पहुंची और उन्हें अंतिम विदाई दी, सोशल मीडिया पर मौजूद इस पल का वीडियो भावुक करने वाला है। 

 

उत्तराखंड की खूबसूरती को देखने दुनिया भर से लोग आते हैं लेकिन कोई विदेशी महिला अस्थियां विसर्जन करने आए ऐसा कम ही सुनने को मिलता है जापान में रहने वाली मियाको कैटलेट को भी अपने पति की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए बागेश्वर आना पड़ा। उनके पति, राबर्ट कैटलेट ऊर्फ वाजिद, जो अमेरिका के अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, का बागेश्वर से गहरा लगाव था।

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मृत्यु से पहले उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी अस्थियां बागेश्वर की पवित्र सरयू नदी में प्रवाहित की जाएं। पति के निधन के बाद मियाको ने इस अंतिम इच्छा को पूरा करने का संकल्प लिया और जापान से बागेश्वर पहुंचीं, जहां उन्होंने विधि-विधान से अस्थियां सरयू में प्रवाहित कीं। इस अवसर पर करीब पौने घंटे तक मंत्रोच्चारण के साथ पूजा-अर्चना की गई।

वाजिद कैटलेट मूल रूप से अमेरिका के निवासी थे और वहां अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। वर्ष 2005 में एक योग साधना शिविर के दौरान उनकी मुलाकात मियाको से हुई।दोनों के बीच का परिचय धीरे-धीरे गहरे रिश्ते में बदल गया। उस समय मियाको जापान में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं। उन्होंने वाजिद को जापान आने और वहां अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में काम करने के लिए आमंत्रित किया। मियाको के आग्रह पर वाजिद वर्ष 2007 में अमेरिका से जापान आ गए और वहीं बस गए।

बागेश्वर ने वाजिद को गहराई से प्रभावित किया। यहां की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आध्यात्मिकता ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि बागेश्वर उनके दिल में बस गया।वर्ष 2007 में जब वह मियाको के साथ दोबारा बागेश्वर आए, तो उन्होंने उन्हें भी इस शहर की खूबसूरती से परिचित कराया। दोनों ने यहां कुछ समय बिताया और वाजिद का बागेश्वर के प्रति लगाव और गहरा होता चला गया। वर्ष 2009 में वाजिद और मियाको ने विवाह कर लिया और जापान में एक साथ रहने लगे।

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हालांकि, वर्ष 2022 में वाजिद को ब्रेन हेमरेज हुआ, जिसके बाद लंबे उपचार के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन का गम मियाको के लिए अत्यंत गहरा था। वह मानसिक पीड़ा और बीमारी से जूझती रहीं, लेकिन वाजिद की अंतिम इच्छा उनके मन में जीवित रही। उन्होंने ठान लिया कि चाहे कितनी भी दूरी क्यों न हो, वह अपने पति की इच्छा पूरी करने बागेश्वर जरूर आएंगी।

मियाको अपने पति की अस्थियां लेकर बागेश्वर पहुंचीं और एक पुजारी के साथ मंदिर के समीप विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। मंत्रोच्चारण के बीच वाजिद की अस्थियां सरयू की पवित्र धारा में प्रवाहित की गईं। इस दौरान उनके परिवार के लोग भी मौजूद रहे। जब सरयू की लहरों में वाजिद की अस्थियां विलीन हुईं, तो मियाको के लिए यह पल अत्यंत भावुक था ही साथ ही पास खड़े लोगों की आंखें नम हो गईं। 

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मियाको का घरेलू नाम ताओमी है। अमेरिका से जापान और फिर बागेश्वर तक की यह यात्रा केवल भौतिक दूरी तय करने की कहानी नहीं है, बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते की एक गहरी कहानी है, जिसमें जीवनसाथी के जाने के बाद भी उसका आखिरी वचन दिल में जीवित रहा। सरयू की पवित्र धारा में वाजिद की अस्थियां भले ही विलीन हो गईं, लेकिन बागेश्वर से उनका जुड़ाव और मियाको का यह भावुक सफर लंबे समय तक याद किया जाएगा।

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