त्योहारों के सीजन में चीनी महंगी होना आम बात, जमाखोरों की मिलीभगत या 'एथेनॉल' का खेल? पूरी कहानी जानिए
त्योहारों का सीजन शुरू होते ही देश के आम उपभोक्ताओं को बड़ा झटका लगा है। देश भर के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतें अचानक आसमान छूने लगी हैं। महज एक महीने के भीतर चीनी के दाम करीब 16% तक बढ़ चुके हैं। जो चीनी जुलाई में ₹48 प्रति किलो के आसपास मिल रही थी, वह अब देश के कई हिस्सों में ₹55 से ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है।
इस कड़वी महंगाई ने जहां आम जनता की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है, वहीं बाजार और गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह त्योहारों पर होने वाली आम बढ़ोतरी है, या इसके पीछे जमाखोरों की कोई बड़ी साजिश है? इस बीच एक बड़ा सवाल 'एथेनॉल ब्लेंडिंग' (गन्ने से ईंधन बनाना) को लेकर भी उठ रहा है। इन तमाम सवालों पर खुद केंद्रीय उपभोक्ता मामले और खाद्य मंत्रालय ने सामने आकर पूरी कहानी साफ की है।
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क्या गन्ने से एथेनॉल बनाने के चक्कर में महंगी हुई चीनी?
आम लोगों के बीच चर्चा है कि चीनी मिलें गन्ने के रस का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाने में कर रही हैं, जिससे खाने वाली चीनी की कमी हो गई है और दाम बढ़ रहे हैं।लेकिन केंद्र सरकार ने इस आरोप को पूरी तरह खारिज करते हुए आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है। सरकार ने साफ किया है कि:
चीनी का इस्तेमाल कम हुआ: पिछले साल के मुकाबले इस सीजन में एथेनॉल बनाने के लिए चीनी के कोटे को 12% से घटाकर सिर्फ 9%कर दिया गया है। यानी चीनी बचाकर खाने के लिए रखी गई है।
अनाज से बन रहा है एथेनॉल: देश में बन रहे कुल एथेनॉल का लगभग 75% (तीन-चौथाई) हिस्सा गन्ने से नहीं, बल्कि मक्का और टूटे चावल जैसे अनाजों से तैयार हो रहा है। इसलिए चीनी महंगी होने के पीछे एथेनॉल का कोई हाथ नहीं है।
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जमाखोरों की मिलीभगत :
सरकार की जांच में यह बात सामने आई है कि कीमतों में इस बेतहाशा बढ़ोतरी के पीछे कुछ बड़े थोक व्यापारियों और चीनी मिलों की मिलीभगत है। त्योहारों में मांग बढ़ने का फायदा उठाकर इन लोगों ने बाजार में चीनी की 'कृत्रिम कमी' (Artificial Scarcity) पैदा करने के लिए भारी स्टॉक छिपा लिया था (जमाखोरी), ताकि बाद में इसे ऊंचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाया जा सके।
त्योहारों में चीनी का महंगा होना आम बात है?
देखा जाए तो रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, नवरात्रि, दिवाली और छठ पूजा के दौरान मिठाई निर्माताओं और आम घरों में चीनी की मांग (Demand) सामान्य दिनों से दोगुनी हो जाती है। मांग बढ़ने पर 1-2 रुपये बढ़ना आम बात माना जाता है, लेकिन इस बार मौसम की मार के कारण देश में चीनी का कुल उत्पादन अनुमानित 343 लाख मीट्रिक टन से घटकर केवल306 लाख मीट्रिक टन रह गया। उत्पादन कम होने और उसी वक्त त्योहारों की भारी मांग आने से जमाखोरों को खेल खेलने का मौका मिल गया।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने आपातकालीन कदम उठाए हैं ताकि कीमतें तुरंत नीचे आएं और आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ ना पड़े
अब सोशल मीडिया का दौर है आम लोग किसी भी बात को बिना तथ्यों की पुष्टि किए बिना सच मान लेते हैं और भय का माहौल पैदा हो जाता है. जैसे अभी एथेनॉल वाली बात को लेकर हो रहा है. फ़िलहाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है और आने वाले दिनों में मुश्किलें और ना बढ़ें चीनी डीलरों के लिए 400 टन की सख्त स्टॉक लिमिट लगा दी गई है। साथ ही बड़ी फैक्ट्रियां (जैसे बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक कंपनियां) अब 15 दिन से ज्यादा का चीनी स्टॉक नहीं रख पाएंगी।
फ्री इम्पोर्ट को मंजूरी: घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त (Duty-Free) आयात को हरी झंडी दे दी है।
जल्दी शुरू होगी पेराई: चीनी मिलों को आदेश दिया गया है कि वे 15 अक्टूबर से ही गन्ने की पेराई का नया सीजन शुरू कर दें ताकि बाजार में नई चीनी जल्दी आ सके।



















