ऋषिकेश-डोईवाला हाईवे प्रोजेक्ट के लिए 3000 पेड़ों की कटाई पर उठे सवाल, विपक्ष और पर्यावरण प्रेमियों ने सरकार को घेरा
उत्तराखंड में ऋषिकेश-डोईवाला राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण को लेकर विकास और पर्यावरण के बीच बहस तेज हो गई है। भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना के तहत 'सात मोड़' क्षेत्र में 3,000 से अधिक पेड़ों की प्रस्तावित कटाई का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। रविवार को परवादून जिला कांग्रेस, स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने सात मोड़ पर प्रदर्शन कर सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बेहतर सड़कें और आधुनिक बुनियादी ढांचा राज्य के विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की कटाई उचित नहीं है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों के हटने से क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होगा, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास सिमटेगा और स्थानीय जलवायु पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। प्रदर्शन के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया गया और अधिक से अधिक लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील की गई।
परवादून जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहित उनियाल ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल, जल स्रोत और प्राकृतिक संपदा हैं। यदि विकास के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई होती रही तो इसका असर केवल पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर जनता के साथ खड़ी है और यदि सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।
इस पूरे मुद्दे पर पद्मश्री सम्मानित पर्यावरणविद डॉ. अनिल जोशी ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास के नाम पर जंगलों का दोहन चिंताजनक है। उनके अनुसार उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत उसके जंगल, जल स्रोत और जैव विविधता हैं। इसलिए ऐसी परियोजनाओं में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि पेड़ केवल हरियाली नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा हैं।
दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का कहना है कि लगभग 20 किलोमीटर लंबी भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश परियोजना को 743 करोड़ रुपये की लागत से हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) के तहत विकसित किया जा रहा है। परियोजना का उद्देश्य देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना, चारधाम यात्रा को सुगम बनाना और बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना है। वर्तमान में इस मार्ग से प्रतिदिन करीब 18,456 वाहन गुजरते हैं, जिससे अक्सर जाम और सड़क हादसों की स्थिति बनती है।
वन विभाग के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में इस मार्ग पर 29 वन्यजीव सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए हैं। इसी कारण परियोजना में करीब 3.5 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर , एक ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास, चार एलीफेंट अंडरपास**, साउंड बैरियर, ग्रीन गाइड हेज, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन, वन्यजीव चेतावनी संकेतक, स्पीड कैल्मिंग उपाय और नो हॉर्न' जोन जैसी व्यवस्थाएं शामिल की गई हैं, ताकि वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।
NHAI का यह भी कहना है कि फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) की सिफारिश पर 754 पेड़ों का प्रतिरोपण मानसून के दौरान किया जाएगा। इसके अलावा वन क्षेत्र में सड़क के लिए आवश्यक भूमि को सीमित रखने के उद्देश्य से राइट ऑफ वे (ROW) को सामान्य 60 मीटर के बजाय 23 मीटर तक सीमित रखा गया है, ताकि जंगलों पर पड़ने वाला प्रभाव कम किया जा सके।
फिलहाल यह परियोजना उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन गई है। एक ओर सरकार और NHAI इसे बेहतर कनेक्टिविटी, पर्यटन और चारधाम यात्रा के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग और पर्यावरणविद मांग कर रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ प्रकृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए।
पढ़ें यह खबर : बद्रीनाथ धाम में गड़बड़ियों की लम्बी लिस्ट- चढ़ावा चोरी मामले के बाद अब दान की एम्बुलेंस भी गायब
संसद के मानसून सत्र से पहले सियासी हलचल तेज, 19 जुलाई को होगी सर्वदलीय बैठक
वियतनाम में दर्दनाक बोट हादसा: 15 भारतीयों की मौत, जांच के बीच लौट रहे हैं जीवित बचे पर्यटक
मासूम को चिप्स का लालच, फिर हैवानियत की इंतहा… गाजियाबाद की घटना ने सबको झकझोर दिया।
Watch Video
Watch the full video for more details on this story.













