साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट, आखिर क्या है इसके पीछे की पौराणिक मान्यता? जानिए पूरी खबर
क्या आप भोलेनाथ के ऐसे मंदिर के बारे में जानते हैं जहां के कपाट साल भर में केवल 1 दिन (नाग पंचमी ) के लिए खुलते हैं. जी हां श्रद्धालु सिर्फ 24 घंटे तक ही इस मंदिर के दर्शन कर सकते हैं और अगली बार दर्शनों के लिए पूरे एक साल का इंतजार करना पड़ता है ये प्रसिद्ध मंदिर है उज्जैन का नागचंद्रेश्वर महादेव इस मंदिर की बनावट, ग्यारहवीं शताब्दी की अद्भुत प्रतिमा और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं बेहद दिलचस्प और रहस्यमयी हैं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक शहरउज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल (तीसरे तल) पर स्थित है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा अनोखा मंदिर है, जिसके कपाट साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के दिन पूरे 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। बाकी के 364 दिन इस मंदिर में आम भक्तों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है।
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नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर की पौराणिक मान्यता और इतिहास :
पौराणिक कथाओं के अनुसार, नागों के राजा नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उज्जैन के महाकाल वन में घोर तपस्या की थी।तक्षक की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए। तक्षक ने महादेव से वरदान मांगा कि वे हमेशा उनके सानिध्य (पास) में रहना चाहते हैं, लेकिन उनकी एकांत साधना में कोई बाधा न आए।
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नागपंचमी के दिन ही क्यों खुलते हैं मंदिर के कपाट :
भगवान शिव ने नागराज तक्षक की इच्छा पूरी की और उन्हें अपने आसन और आभूषण के रूप में स्थान दिया। मान्यता है कि नागराज तक्षक आज भी इस मंदिर में अदृश्य रूप में वास करते हैं और सालभर समाधि में रहते हैं। उनके एकांत और निद्रा में विघ्न न पड़े, इसीलिए मंदिर के कपाट केवल नाग पंचमी के दिन ही खोले जाते हैं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर का इतिहास :
माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के आसपास इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में 1732 में सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर के साथ-साथ इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार (मरम्मत) करवाया था।
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मंदिर की अद्भुत और दुर्लभ प्रतिमा :
आमतौर पर दुनिया भर के शिव मंदिरों में भगवान शिव के आसन के रूप में नंदी (बैल) को देखा जाता है। लेकिन नागचंद्रेश्वर मंदिर में एक बेहद अनोखी 11वीं शताब्दी की प्रतिमा है,इस प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती सात फनों वाले शेषनाग (या नागराज तक्षक) के आसन पर विराजमान हैं।उनके साथ भगवान गणेश और कार्तिकेय भी सुंदर मुद्रा में दिखाई देते हैं।ऐसा माना जाता है कि यह दुर्लभ प्रतिमा नेपाल से उज्जैन लाई गई थी।
नागपंचमी पर नागचंद्रेश्वर के दर्शनों से मिलती है सर्पदोषों से मुक्ति :
हिंदू धर्म में नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन का बहुत बड़ा महत्व माना गया है,ऐसी मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन इस मंदिर में नागदेव और शिव-पार्वती के दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन से सर्प दोष, कालसर्प दोष और पितृ दोष हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।जो लोग सांपों के सपने या अकारण भय (सर्प भय) से परेशान रहते हैं, उन्हें नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन से मानसिक शांति मिलती है।
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नागपंचमी कपाट खुलने और पूजा की प्रक्रिया :
नाग पंचमी के अवसर पर इस मंदिर की परंपराएं बेहद नियमबद्ध तरीके से निभाई जाती हैं.नाग पंचमी कीश्रावण शुक्ल पंचमी की मध्यरात्रि (रात 12:00 बजे) महानिर्वाणी अखाड़े के महंतों द्वारा विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के पट खोले जाते हैं।24 घंटे के इस समय में भगवान की तीन बार विशेष आरती (त्रिकाल पूजा) होती है। पहली पूजा मध्यरात्रि में कपाट खुलने पर, दूसरी पूजा नाग पंचमी के दोपहर में और तीसरी पूजा रात को होती है।
नाग पंचमी की रात 12:00 बजे महाआरती के बाद मंदिर के कपाट दोबारा एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। अगर कभी अवसर मिले तो जीवन में एक बार जरूर श्री नागचंद्रेश्वर महादेव के दर्शन जरूर करें,जानकारी पसंद आए तो महादेव के भक्तों के साथ साझा जरूर करें।
महाकाल मंदिर उज्जैन से हमारे संवाददाता गोपाल आंजना की खास रिपोर्ट



















