बद्रीनाथ की वो परंपरा जब भगवान को दिया जाता था चढ़ावे का हिसाब ,टिहरी नरेश से लेकर BKTC तक ऐसे बदले नियम
उत्तराखंड : बद्रीनाथ धाम में चढ़ावा चोरी का मामला इन दिनों चर्चा में है. इस मामले में अब तक मंदिर समिति से जुड़े दो लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है,बद्रीनाथ धाम की मंदिर व्यवस्था समय-समय पर बदलती रही कभी ऐसा भी समय था जब भगवान बद्री विशाल को चढ़ावे के बारे में सुनाया जाता था। आज फिर सवाल उठ रहे हैं कि अगर ये परंपरा आज भी होती तो शायद चढ़ावा चोरी ना होता।
बद्रीनाथ धाम की अनोखी परम्परा : बदरीनाथ धाम में वर्षों तक एक अनूठी धार्मिक परंपरा का पालन किया जाता था। जब भी मंदिर के दान पात्रों और थाली भेंट की गणना पूरी होती थी, तो चढ़ावे का पूरा ब्योरा भगवान बद्री विशाल को सुनाया जाता था। इस परंपरा के तहत बीकेटीसी के मुख्य कार्याधिकारी शयन आरती के बाद मंदिर के मंडप में पहुंचते थे और गर्भगृह की ओर मुख करके नकद धनराशि, सोना, चांदी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं का पूरा विवरण पढ़कर सुनाते थे।
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भगवान को हिसाब सुनाना: बदरीनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए नकद, सोने-चांदी व कीमती भेंटों का पूरा ब्यौरा रोज़ाना रात की शयन आरती के बाद भगवान बदरीविशाल के सामने पढ़ा जाता था।
पारदर्शिता का प्रतीक: बीकेटीसी के मुख्य कार्याधिकारी (CEO) तीर्थयात्रियों व वेदपाठियों की मौजूदगी में यह हिसाब पढ़ते थे और प्रार्थना करते थे कि यह चढ़ावा प्रभु के ही निमित्त इस्तेमाल हो। यह मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता का प्रतीक था।
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शुरुआत और बंद होने की वजह :
शुरुआत:इस पारदर्शी व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 2012 में तत्कालीन सीईओ बीडी सिंह द्वारा की गई थी, जो कोरोना काल तक चलती रही।
बंद होने का कारण:वर्ष 2021 में बीडी सिंह के सेवानिवृत्त (रिटायर) होने के बाद, यह परंपरा भी समाप्त हो गई, हालांकि दान पात्रों की गिनती आज भी होती है।
बद्रीनाथ धाम से जुड़ा हुआ पुराना विवाद :
2012 में पारदर्शिता के लिए कर्मचारियों को 'ढांगरी' (बिना जेब वाले विशेष कपड़े) पहनकर गिनती करने का आदेश दिया गया था, जिसका कर्मचारियों ने विरोध किया था।
बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC ) का इतिहास :
इस समिति का गठन 'श्री बदरीनाथ तथा श्री केदारनाथ मंदिर अधिनियम 1939' के तहत किया गया था। इसका उद्देश्य मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा, दान का सही उपयोग और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देना था।
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BKTC से पहले रावल और टिहरी राजदरबार के हाथों में थी कमान : 1939 से पहले बद्रीनाथ धाम का पूरा प्रबंधन रावल (मुख्य पुजारी) के हाथों में था और टिहरी राजदरबार के पास केवल देखरेख का अधिकार था। उनके बीच आपसी मतभेद के कारण मंदिर की आय का नुकसान हो रहा था, जिसके बाद सरकार ने इस समिति का निर्माण किया।बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल के नंबूदरी समुदाय से होते हैं जिन्हें 'रावल ' कहा जाता है।
बद्रीधाम और टिहरी राजवंश का सदियों पुराना नाता : टिहरी राजदरबार (पवार/परमार राजवंश) और भगवान बद्रीनाथ धाम का संबंध सदियों पुराना और बेहद अटूट है। गढ़वाल नरेश को भगवान बद्री विशाल का ही रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें "बोलंदा बद्रीनाथ" (बोलने वाले बद्रीनाथ) भी कहा जाता है।
गाड़ू घड़ा (तेल कलश) परंपरा : यह बद्रीनाथ धाम की सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य परंपरा है, जिसके बिना कपाट नहीं खुल सकते .
तिल का तेल निकालना: बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले, नरेंद्रनगर (टिहरी) स्थित राजमहल में एक भव्य उत्सव होता है। राजपरिवार की महारानी की अगुवाई में सौभाग्यवती (सुहागिन) महिलाएं व्रत रखकर, पीले वस्त्र पहनकर पारंपरिक मंगल गीतों के बीच मूसल-सिलबट्टे से तिल का तेल निकालती हैं।इस पवित्र तेल को एक विशेष घड़े (गाड़ू घड़ा) में भरा जाता है। डिमरी समाज के पुजारी इस कलश को कड़ी सुरक्षा और धार्मिक नियमों के साथ बद्रीनाथ धाम ले जाते हैं। इसी तेल से मंदिर में 6 महीने तक भगवान का अभिषेक और अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है।
बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि टिहरी महाराज की कुंडली देखकर निकाली जाती है :
हर साल बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर नरेंद्रनगर राजमहल में एक विशेष धार्मिक समारोह आयोजित किया जाता है। टिहरी महाराज की जन्म कुंडली (जन्म पत्र) की गणना के आधार पर राजपुरोहितों द्वारा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की सही तिथि और शुभ मुहूर्त की घोषणा की जाती है। आज भी ये परंपरा निभाई जाती है।
एक बार फिर श्रद्धालुओं में पुरानी परम्पराओं और नियमों की चर्चाएं तेज हैं और ये भी कहा जा रहा है कि पूर्व के नियमों पर मंदिर का प्रबंधन होता तो भू बैकुंठ बद्री धाम में चढ़ावा चोरी जैसा कृत्य करने का कोई दुस्साहस नहीं करता।



















