पिथौरागढ़ की हिलजात्रा: मुखौटों में सजी पहाड़ की संस्कृति, सदियों पुरानी परंपरा का अद्भुत रंग
पिथौरागढ़: कुमाऊं की प्रसिद्ध लोक परंपरा हिलजात्रा का आयोजन आज यानी 24 अगस्त को दोपहर 2 बजे से किया जाएगा। हर साल बड़ी संख्या में लोग इस अनोखे उत्सव को देखने पहुंचते हैं, जहां विशाल मुखौटे, पारंपरिक वेशभूषा और लोक प्रस्तुतियों के जरिए पहाड़ के जीवन और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
हिलजात्रा पिथौरागढ़ की सोर घाटी की सबसे खास सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। इसका प्रमुख आयोजन कुमौर गांव में होता है। यह उत्सव सिर्फ नृत्य और मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके हर पात्र और प्रस्तुति के पीछे पहाड़ के कृषि जीवन, पशुपालन और लोक आस्थाओं की अपनी एक कहानी है।
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खेती-किसानी से जुड़ी है परंपरा
हिलजात्रा का संबंध पहाड़ के पारंपरिक कृषि जीवन से माना जाता है। उत्सव में कलाकारों द्वारा हल चलाने, खेती करने और पशुपालन से जुड़े दृश्यों को प्रस्तुत किया जाता है। कभी खेती पहाड़ के लोगों के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी और हिलजात्रा उसी जीवनशैली की यादों को आज भी जीवंत रखे हुए है।
इस परंपरा के इतिहास को पिथौरागढ़ और पश्चिमी नेपाल के पुराने सांस्कृतिक संबंधों से भी जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि समय के साथ यह परंपरा सोर घाटी में पहुंची और यहां की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई।
लखिया भूत क्यों है हिलजात्रा की खास पहचान?
हिलजात्रा की सबसे चर्चित प्रस्तुतियों में लखिया भूत शामिल है। विशाल मुखौटा और अलग वेशभूषा में जब यह पात्र मैदान में आता है तो दर्शकों की नजरें उसी पर टिक जाती हैं। स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं में लखिया का विशेष महत्व है, यही वजह है कि इसे हिलजात्रा का सबसे आकर्षक पात्र भी माना जाता है।
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इसके अलावा हिरण-चीतल समेत कई पशु-पक्षियों और ग्रामीण जीवन से जुड़े पात्रों के रूप भी इस उत्सव में दिखाई देते हैं। इन मुखौटों और प्रस्तुतियों के जरिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति और इंसान के बीच के पुराने रिश्ते को भी दर्शाया जाता है।
सिर्फ उत्सव नहीं, सांस्कृतिक विरासत है हिलजात्रा
ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक संगीत के बीच होने वाली हिलजात्रा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी काम करती है। बदलते समय में जहां कई लोक परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं, वहीं हिलजात्रा आज भी पिथौरागढ़ के लोगों की सांस्कृतिक पहचान को संभाले हुए है।
आज दोपहर 2 बजे से शुरू होने वाली हिलजात्रा में एक बार फिर मुखौटों और लोक पात्रों के जरिए पहाड़ का पारंपरिक जीवन जीवंत होगा और पिथौरागढ़ की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत लोगों के सामने नजर आएगी।













