खटीमा गोलीकांड: 7 शहीदों की वो दास्तां, जिनकी शहादत की बुनियाद पर खड़ा है आज का उत्तराखंड
उत्तराखंड के इतिहास में आज का दिन यानी 1 सितंबर एक गहरे जख्म और अदम्य साहस की याद दिलाता है। साल 1994 में आज ही के दिन खटीमा की धरती पर पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। इस बर्बर कार्रवाई में 7 आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। इस घटना को उत्तराखंड राज्य आंदोलन का टर्निंग पॉइंट माना जाता है, जिसने जन-आंदोलन की आग को पूरे पहाड़ी क्षेत्र में फैला दिया।
शांतिपूर्ण जुलूस पर बरसीं गोलियां :
1 सितंबर 1994 को खटीमा में हजारों की संख्या में छात्र, पूर्व सैनिक, महिलाएं और स्थानीय लोग एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाल रहे थे। उनकी मांग बहुत स्पष्ट थी—उत्तर प्रदेश से अलग कर एक पहाड़ी राज्य 'उत्तराखंड' का गठन किया जाए। आंदोलनकारी जैसे ही मुख्य चौराहे की ओर बढ़े, पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बिना किसी ठोस चेतावनी के सीधे गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
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7 आंदोलनकारी हुए शहीद, 165 से अधिक घायल :
खटीमा गोलीकांड में सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पुलिस की इस क्रूर कार्रवाई में मौके पर ही 7 जांबाज आंदोलनकारी शहीद हो गए। इनके नाम इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए.
इनकी हुई थी शहादत :
- अमर शहीद प्रताप सिंह
- अमर शहीद सलीम अहमद
- अमर शहीद भगवान सिंह सिरोला
- अमर शहीद रामपाल
- अमर शहीद भुवन चंद्र
- अमर शहीद परमजीत सिंह
- अमर शहीद गोपीचंद
7 आंदोलनकारियों के शहीद होने गोलीकांड में 165 से अधिक लोगों के गंभीर रूप से घायल होने पर तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार (मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री) की इस कार्रवाई की पूरे देश में तीखी आलोचना हुई थी।
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पृथक राज्य आंदोलन का टर्निंग पॉइंट बना खटीमा गोलीकांड :
1 सितम्बर को हुए खटीमा गोलीकांड ने ठंडे पड़ रहे आंदोलन में घी का काम किया। इस घटना के विरोध में अगले ही दिन, यानी 2 सितंबर 1994 को मसूरी में भी आंदोलनकारी सड़कों पर उतर आए, जहां फिर से पुलिस ने गोलियां चलाईं (मसूरी गोलीकांड)। इन शहादतों ने उत्तराखंड के कोने-कोने में रहने वाले लोगों को एकजुट कर दिया। 2 अक्टूबर 1994 को गांधी जयंती के दिन रामपुर तिराहा पर गोलीकांड और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ. आखिरकार जनता के इसी भारी दबाव के आगे झुकते हुए केंद्र सरकार को 9 नवंबर 2000 को अलग उत्तराखंड राज्य का गठन करना पड़ा।
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26 सालों में भी राज्य आंदोलनकारियों के सपने अधूरे :
राज्य आंदोलनकारियों और पूरे उत्तराखंड के जन-मानस की मांग थी कि उत्तरप्रदेश से अलग होकर एक पहाड़ी राज्य बने. इसे हर सुविधा उपलब्ध हो और छोटे से राज्य का चहुंमुखी विकास हो. लेकिन आज 26 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं और पहाड़ के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए आज भी आंदोलन करने को मजबूर हैं. सरकार राज्य स्थापना दिवस और शहीद दिवस पर बड़े-बड़े आयोजन तो करती है लेकिन आम जनता की मुश्किलों को समझने में अब भी नाकाम नजर आती है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सभी शहीदों को शत-शत नमन !













