इच्छामृत्यु प्रक्रिया: एम्स में हरीश राणा का केस, क्या है Passive Euthanasia और भारत का कानून
इच्छामृत्यु प्रक्रिया: एम्स में हरीश राणा का केस और भारत में कानून
दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences (एम्स) में गाजियाबाद निवासी हरीश राणा का मामला इन दिनों चर्चा में है। यह केस भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है। हरीश राणा, जो पिछले कई वर्षों से Quadriplegia से पीड़ित हैं, अब एक नियंत्रित और कानूनी प्रक्रिया के तहत जीवनरक्षक उपचार से हटाए जा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
हरीश राणा 2013 में एक हादसे के बाद गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके चलते उन्हें स्थायी लकवा हो गया। तब से वे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर जीवन जी रहे थे। लंबे समय तक वेंटिलेटर और कृत्रिम पोषण पर रहने के बाद अब उनकी स्थिति को देखते हुए इच्छामृत्यु प्रक्रिया शुरू की गई है।
एम्स के डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर से हटाकर सामान्य बेड पर शिफ्ट कर दिया है। साथ ही फीडिंग ट्यूब को बंद कर दिया गया है, हालांकि जरूरी दवाएं अभी भी दी जा रही हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह मेडिकल प्रोटोकॉल और विशेषज्ञों की निगरानी में की जा रही है।
Passive Euthanasia क्या होती है?
भारत में इच्छामृत्यु दो प्रकार की मानी जाती है:
Active Euthanasia
Passive Euthanasia
Passive Euthanasia में मरीज की जान लेने के लिए कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया जाता, बल्कि जीवन को बनाए रखने वाले उपकरण और उपचार हटा दिए जाते हैं। इससे मरीज की मृत्यु प्राकृतिक रूप से होती है।भारत में इसे Supreme Court of India ने सख्त दिशा-निर्देशों के साथ अनुमति दी है। इसका उद्देश्य मरीज को असहनीय पीड़ा से राहत देना और उसे गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार देना है।
मेडिकल प्रक्रिया कैसे चलती है?
हरीश राणा के मामले में एक विस्तृत मेडिकल बोर्ड बनाया गया है, जिसमें 10 विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं। पहले यह बोर्ड 5 सदस्यों का था, लेकिन कोर्ट के निर्देश के बाद इसे बढ़ाया गया।
इस प्रक्रिया के मुख्य चरण हैं:
मरीज की स्थिति का निरंतर मूल्यांकन
परिवार की सहमति और काउंसलिंग
जीवनरक्षक उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से हटाना
कोर्ट को नियमित रिपोर्ट देना
डॉक्टरों के अनुसार, यह प्रक्रिया धीरे-धीरे की जाती है ताकि मरीज को किसी प्रकार की तकलीफ न हो।
पैलिएटिव केयर की भूमिका
हरीश राणा को अब पैलिएटिव केयर में रखा गया है। यह चिकित्सा पद्धति जीवन बचाने के बजाय मरीज को आराम देने पर केंद्रित होती है।
पैलिएटिव केयर में:
दर्द कम किया जाता है
मानसिक और भावनात्मक समर्थन दिया जाता है
मरीज की गरिमा बनाए रखी जाती है
विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें मृत्यु को तेज नहीं किया जाता, बल्कि प्राकृतिक रूप से होने दिया जाता है।
कितना समय लग सकता है?
इच्छामृत्यु प्रक्रिया में समय का अनुमान लगाना कठिन होता है। डॉक्टरों का कहना है कि:
पोषण बंद होने के बाद भी मरीज 15 दिन से लेकर एक महीने या उससे अधिक समय तक जीवित रह सकता है
हर मरीज की शारीरिक स्थिति अलग होती है
इसलिए सटीक समय बताना संभव नहीं है
अंगदान की संभावना
हरीश राणा के परिवार ने अंगदान का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। यह एक सराहनीय कदम है जो कई लोगों को जीवन दे सकता है।
डॉक्टरों द्वारा जिन अंगों की जांच की जा रही है, उनमें शामिल हैं:
किडनी
दिल
पैंक्रियास
आंतें
कॉर्निया और हार्ट वाल्व
अंतिम निर्णय अंगों की कार्यक्षमता पर निर्भर करेगा।
भारत में इच्छामृत्यु का कानून
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानून स्पष्ट लेकिन सख्त है। Supreme Court of India ने 2018 में Passive Euthanasia को मान्यता दी थी और “लिविंग विल” (Living Will) को भी वैध ठहराया।
लिविंग विल के तहत:
व्यक्ति पहले से तय कर सकता है कि गंभीर स्थिति में उसे किस तरह का इलाज दिया जाए
इससे परिवार और डॉक्टरों को निर्णय लेने में मदद मिलती है
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