भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी: क्या है Passive Euthanasia और दुनिया में इसका कानून
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी: क्या है Passive Euthanasia?
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने पहली बार देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति देते हुए एक विशेष मामले में अपील को स्वीकार किया है। यह फैसला दो न्यायाधीशों की पीठ ने सुनाया, जिसमें 13 वर्षों से अचेत अवस्था में पड़े एक युवक के मामले पर निर्णय दिया गया।
यह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले 32 वर्षीय हरीश राणा से जुड़ा था। हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में थे। उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी और वह पूरी तरह जीवन रक्षक प्रणालियों पर निर्भर थे। बेटे की गंभीर स्थिति को देखते हुए उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।
क्या होती है इच्छामृत्यु?
इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को समाप्त करना या समाप्त होने देना, जो असाध्य बीमारी या असहनीय शारीरिक पीड़ा से गुजर रहा हो। इसका उद्देश्य मरीज को असहनीय दर्द और कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है। आमतौर पर इच्छामृत्यु दो प्रकार की होती है—सक्रिय इच्छामृत्यु और निष्क्रिय इच्छामृत्यु।
सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)
सक्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर या कोई अन्य व्यक्ति सीधे तौर पर ऐसा कदम उठाता है जिससे मरीज की मृत्यु हो जाए। उदाहरण के तौर पर मरीज को घातक इंजेक्शन या दवा देना। इस प्रक्रिया में मृत्यु को जानबूझकर और सक्रिय रूप से उत्पन्न किया जाता है।
दुनिया के अधिकांश देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध मानी जाती है। हालांकि कुछ देशों में कड़े नियमों और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के तहत इसे अनुमति दी गई है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर मरीज को मारने के लिए कोई सीधी कार्रवाई नहीं करते। इसके बजाय जीवन रक्षक उपचार को रोक दिया जाता है या हटा लिया जाता है। उदाहरण के लिए वेंटिलेटर, कृत्रिम जीवन समर्थन प्रणाली या जीवन बनाए रखने वाली दवाओं को बंद कर दिया जाता है।
इस स्थिति में मरीज की मृत्यु प्राकृतिक रूप से होती है। इसे नैतिक रूप से सक्रिय इच्छामृत्यु की तुलना में अधिक स्वीकार्य माना जाता है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर मृत्यु नहीं दी जाती बल्कि केवल कृत्रिम जीवन समर्थन हटाया जाता है।
इच्छामृत्यु का ऐतिहासिक संदर्भ
इच्छामृत्यु की अवधारणा नई नहीं है। प्राचीन समय से ही इस विषय पर चर्चा होती रही है। यूनानी दार्शनिक Plato ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "रिपब्लिक" में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था। वहीं चिकित्सा जगत में डॉक्टरों की नैतिक जिम्मेदारी को निर्धारित करने वाली Hippocratic Oath में डॉक्टरों को घातक दवा देने से मना किया गया था।
प्राचीन भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा "प्रायोपवेश" यानी आमरण अनशन के माध्यम से जीवन त्यागने का उल्लेख मिलता है, जो आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना से जुड़ा माना जाता था।
दुनिया में इच्छामृत्यु का कानून
दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को अलग-अलग रूपों में कानूनी मान्यता मिली हुई है।
यूरोप में Netherlands और Belgium ऐसे देश हैं जहां सक्रिय इच्छामृत्यु को स्पष्ट कानूनी ढांचे के तहत अनुमति दी गई है। इसके अलावा Canada में "मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग" (MAiD) कार्यक्रम के तहत डॉक्टर की सहायता से मृत्यु की अनुमति है।
Switzerland में 1940 के दशक से ही सहायता प्राप्त आत्महत्या को कानूनी मान्यता प्राप्त है। वहीं Spain और New Zealand जैसे देशों ने भी हाल के वर्षों में इच्छामृत्यु से संबंधित कानून बनाए हैं।
हालांकि कई देशों, विशेषकर इस्लामिक देशों में, धार्मिक और नैतिक कारणों से इच्छामृत्यु पर पूर्ण प्रतिबंध है।
भारत में इच्छामृत्यु पर कानून
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कुछ मामलों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में स्वीकार किया है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में "लिविंग विल" को भी मान्यता दी थी। लिविंग विल का मतलब है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह तय कर सकता है कि गंभीर या असाध्य स्थिति में उसे जीवन रक्षक प्रणालियों पर कितने समय तक रखा जाए।
नैतिक और सामाजिक बहस
इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया भर में नैतिक और सामाजिक बहस जारी है। समर्थकों का मानना है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन और मृत्यु से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए, खासकर तब जब वह असहनीय दर्द से गुजर रहा हो। वहीं विरोधियों का कहना है कि इससे जीवन की पवित्रता पर सवाल उठते हैं और इसके दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है।
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