वेब स्टोरी

13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा का निधन: सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति के बाद खत्म हुआ संघर्ष

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की जीवन यात्रा आखिरकार एक लंबे और दर्दनाक संघर्ष के बाद समाप्त हो गई। 13 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद आज उनका निधन दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हो गया। यह मामला न केवल चिकित्सा जगत, बल्कि कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद संवेदनशील और चर्चा का विषय रहा है।

हरीश राणा पिछले कई वर्षों से एम्स के इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल (आईआरसीएच) में भर्ती थे, जहां उन्हें उपशामक (पैलिएटिव) देखभाल वार्ड में रखा गया था। बीते एक सप्ताह से उनकी स्थिति पर डॉक्टरों की विशेष टीम लगातार नजर बनाए हुए थी।

इच्छामृत्यु की अनुमति और अंतिम दिन

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत, Supreme Court of India, ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी थी। यह फैसला करीब आठ महीने तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 11 मार्च 2026 को आया। अदालत की अनुमति मिलने के बाद चिकित्सकीय दिशा-निर्देशों के तहत उन्हें जीवन रक्षक सहायता और भोजन-पानी देना बंद कर दिया गया। यह प्रक्रिया अत्यंत सावधानी और मेडिकल निगरानी में शुरू की गई थी।

बताया जा रहा है कि हरीश पिछले लगभग एक सप्ताह से बिना खाना और पानी के थे। यह प्रक्रिया करीब छह दिनों तक चली, जिसके बाद अंततः उनका निधन हो गया। इस दौरान उनके माता-पिता किसी चमत्कार की उम्मीद में लगातार उनके पास मौजूद रहे।

13 साल पुराना हादसा

हरीश राणा की यह दुखद कहानी साल 2013 में शुरू हुई थी। उन्होंने 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था और वह अपने अंतिम वर्ष के छात्र थे। अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन, जब वह अपनी बहन से मोबाइल फोन पर बात कर रहे थे, तभी वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इस दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आईं।

पहले उन्हें Postgraduate Institute of Medical Education and Research में भर्ती कराया गया, जहां उनकी हालत गंभीर बनी रही। बाद में दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के Lok Nayak Jai Prakash Narayan Hospital में शिफ्ट किया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया नामक गंभीर स्थिति से ग्रसित हो गए हैं।

क्वाड्रिप्लेजिया: एक गंभीर स्थिति

क्वाड्रिप्लेजिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति के चारों अंग (दोनों हाथ और दोनों पैर) पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इस स्थिति में मरीज पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है और सामान्य जीवन जी पाना असंभव हो जाता है।

हरीश राणा भी इस स्थिति में पूरी तरह बिस्तर पर निर्भर हो गए थे। वह न तो बोल सकते थे और न ही अपने शरीर को नियंत्रित कर सकते थे। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने के कारण उन्हें असहनीय शारीरिक और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा।

परिवार की कानूनी लड़ाई

अपने बेटे की इस स्थिति को देखते हुए हरीश के माता-पिता ने उसे इच्छामृत्यु देने की अनुमति के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। उन्होंने पहले दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब आठ महीने की सुनवाई और विभिन्न मेडिकल रिपोर्ट्स की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया और हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी।

एक संवेदनशील और जटिल मामला

हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु को लेकर चल रही बहस को फिर से सामने लाता है। यह सवाल उठाता है कि क्या गंभीर और असाध्य स्थिति में मरीज को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए।

जहां एक ओर यह फैसला मानवीय दृष्टिकोण से राहत देने वाला माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह नैतिक और कानूनी जटिलताओं से भी जुड़ा हुआ है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में हर पहलू—मरीज की स्थिति, परिवार की इच्छा, और मेडिकल रिपोर्ट—को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लिया जाता है।

Watch Video

Watch the full video for more details on this story.

You Might Also Like

Facebook Feed