यमुना जयंती 2026: जानें मां यमुना का महत्व, उद्गम, धार्मिक मान्यता और परंपराएं
भारत की पवित्र नदियों में Yamuna River का विशेष स्थान है। Ganga River के बाद यमुना देश की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय नदी मानी जाती है। हिंदू धर्म में इसे मां का दर्जा प्राप्त है और इसकी पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है।
हर वर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यमुना जयंती मनाई जाती है। यह दिन धरती पर मां यमुना के अवतरण का उत्सव माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु यमुना नदी में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं और पापों से मुक्ति की कामना करते हैं।
धार्मिक महत्व और मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथ Padma Purana में यमुना नदी को पाप नाशिनी, शोक हरिणी और कल्याणी कहा गया है। मान्यता है कि यमुना भगवान सूर्य की पुत्री और यमराज की बहन हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जो भी व्यक्ति यमुना नदी में स्नान करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि यमुना जयंती के दिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में नदी तटों पर पहुंचते हैं।
यमुना का उद्गम स्थल
यमुना नदी का उद्गम उत्तराखंड के Uttarkashi जिले में स्थित कालिंदी पर्वत से होता है। यह समुद्र तल से लगभग 4421 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसी कारण यमुना को कालिंदी नदी भी कहा जाता है। वहीं, गंगा नदी का उद्गम Gaumukh (गंगोत्री ग्लेशियर) से होता है, जो लगभग 3892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
यमुना नदी उत्तरकाशी से निकलकर करीब 1376 किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हुए Prayagraj में गंगा से मिलती है। इस यात्रा के दौरान यह कई राज्यों से होकर गुजरती है और लाखों लोगों के जीवन का आधार बनती है।
उत्तराखंड में यमुना का महत्व
उत्तराखंड में यमुना नदी लगभग 170 किलोमीटर तक बहती है और कई स्थानों पर यह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच प्राकृतिक सीमा भी बनाती है। यमुना का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल Yamunotri Dham है, जो चारधाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर साल हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
खरसाली में मां यमुना का शीतकालीन प्रवास
यमुनोत्री धाम के कपाट शीतकाल में बंद होने के बाद मां यमुना की पूजा Kharsali Village में की जाती है। यह गांव मां यमुना का शीतकालीन प्रवास स्थल माना जाता है। यहां मां यमुना को बेटी का दर्जा दिया गया है। जब यमुनोत्री मंदिर के कपाट बंद होते हैं, तब मां यमुना की डोली को खरसाली लाया जाता है और उसका स्वागत मायके आई बेटी की तरह किया जाता है। इसी तरह, जब कपाट खुलते हैं, तब मां यमुना की विदाई भी बेटी की तरह भावुकता के साथ की जाती है। यह परंपरा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था को दर्शाती है।
यमुना: केवल नदी नहीं, जीवन का आधार
यमुना नदी सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत भी है। यमुनोत्री यात्रा मार्ग—धरासू, डामटा, बड़कोट और जानकीचट्टी जैसे क्षेत्रों में होटल, ढाबे और अन्य व्यवसाय तीर्थयात्रियों पर निर्भर रहते हैं। जब यमुनोत्री धाम के कपाट खुले रहते हैं, तब इन क्षेत्रों में काफी चहल-पहल रहती है। वहीं कपाट बंद होने के बाद यहां सन्नाटा छा जाता है। इसके अलावा, यमुनोत्री पैदल मार्ग पर घोड़े-खच्चर, डंडी-कंडी संचालकों की आजीविका भी इसी यात्रा पर निर्भर करती है।
यमुना जयंती के अवसर पर विशेष आयोजन
यमुना जयंती का दिन यमुनोत्री धाम और खरसाली दोनों जगहों पर बेहद खास होता है। इसी दिन पंचांग गणना के आधार पर Char Dham Yatra के अंतर्गत यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने की तिथि और समय की घोषणा की जाती है।
खरसाली में स्थित यमुना मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है। यहां यमुना नदी के तट पर 1008 दीपों के साथ भव्य दीपदान किया जाता है। इसके साथ ही लोक वाद्य यंत्रों की धुन पर कलश यात्रा निकाली जाती है और “चुनरी मनोरथ” जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित किए जाते हैं।
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