उत्तराखंड के एक परिवार से निकले थे 5 स्वतंत्रता सेनानी, जानिए वो किस्सा जब हिल गए थे ब्रिटिश
आज पूरा देश स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगाँठ मना रहा है,आपने देश के कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां सुनी होंगी.लेकिन आज हम आपको एक ऐसी अनसुनी कहानी बताने जा रहे हैं, जो वीरभूमि उत्तराखंड की है.नैनीताल के कंसल परिवार से एक दो नहीं बल्कि 5 स्वतंत्रता सेनानी निकले।
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यह दास्तान है नैनीताल जिले के भवाली के रहने वाले 'कंसल परिवार' की, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर दिया था।इस कहानी की शुरुआत होती है बाबू राम कंसल से।जब महात्मा गांधी, सुचेता कृपलानी और पंडित जवाहरलाल नेहरू आजादी के आंदोलन को धार देने नैनीताल पहुंचे, तब भवाली में बाबू राम कंसल जी ने इस आंदोलन को तेजी से विस्तार दिया और उनका घर क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों का मुख्य ठिकाना बन गया।
जब ब्रिटिश झंडा उखाड़ कर फहराया स्वराज ध्वज :
इसी परिवार के बड़े बेटे बंशीधर उर्फ वंशी लाल कंसल ने तो छात्र जीवन में ही अंग्रेजों को सीधी चुनौती दे दी। उन्होंने नैनीताल के हम्फ्री स्कूल में ब्रिटिश झंडा उखाड़ फेंका और वहां गर्व से 'स्वराज ध्वज' यानी चरखे वाला तिरंगा फहरा दिया। इस दिलेरी के लिए उन्हें जेल भेज दिया गया।
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घर के बड़ों को हुई जेल तो आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा पूरा परिवार :
घर के बड़ों को जेल हुई लेकिन कंसल परिवार के हौसले नहीं टूटे। जब 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बाबू राम कंसल और बड़े बेटे वंशी लाल को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया, तब घर के इन बड़े सेनानियों की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन की कमान उनके दूसरे बेटे भू प्रकाश बंसल ने संभाली और रैलियां जारी रखीं।इतना ही नहीं, इस लड़ाई में घर के भतीजे—बांके लाल और विद्याप्रकाश भी कूद पड़े। इन दोनों भतीजों ने अंग्रेजों की संचार व्यवस्था ठप करने और भूमिगत रहकर क्रांतिकारियों तक संदेश पहुंचाने का बेहद जोखिम भरा काम किया।
महिलाओं ने आजादी के लिए तोड़े सामजिक बंधन :
वहीं दूसरी तरफ, सामाजिक बंधनों को तोड़कर घर की बहुओं और महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर विदेशी कपड़ों की होली जलाई और शराबबंदी के लिए धरने दिए।
स्वतंत्रता सेनानी भू प्रकाश बंसल ने सरकारी पेंसन समाज सेवा को कर दी समर्पित :
आजादी के बाद, स्वतंत्रता सेनानी भू प्रकाश बंसल ने ईमानदारी की एक अनोखी मिसाल पेश की। उन्हें सरकार से जो पेंशन मिलती थी, वे उसका एक-एक पैसा गरीबों की मदद और समाज सेवा में लगा देते थे।
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लाल बहादुर शास्त्री भी भू प्रकाश बंसल के कायल थे :
जब भू प्रकाश बंसल जी का देहांत हुआ, तो उनके अंतिम दर्शनों के लिए लोगों का ऐसा हुजूम उमड़ पड़ा जिसे देखकर देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी भी भावुक हो उठे। उन्होंने तब कहा था कि—"अगर ऐसी सम्मान की मौत मिले, तो मैं आज ही मरने को तैयार हूँ।
स्वाभिमानी था कंसल परिवार :
कंसल परिवार ने देशभक्ति की ऐसी मिसाल दी कि आज भी लोग उनके त्याग को याद करते हैं उनके त्याग और स्वाभिमान की यह कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। आजादी दिलाने के बदले में जब भारत सरकार ने इस कंसल परिवार को जमीन भेंट करनी चाह, तो इस स्वाभिमानी परिवार ने उसे ठुकरा दिया और कहा कि—"हमने अपनी मातृभूमि की आजादी की लड़ाई किसी इनाम या मेहनताना के लिए नहीं लड़ी थी, यह तो देश के प्रति हमारा कर्तव्य था।
"एक ही परिवार के इन 5 रणबांकुरों के इसी अद्वितीय त्याग के कारण, आज भी इतिहास में इन्हें 'पंच-वीर परिवार' के नाम से याद किया जाता है। आजादी की इस 80वीं वर्षगाँठ पर, नेशन वन की पूरी टीम इस अमर कंसल परिवार को कोटि-कोटि नमन करती है।













