वेब स्टोरी

कुंभ मेले का बदलता स्वरूप: आध्यात्म से अतिक्रमण तक, संत ने उठाए गंभीर सवाल

कुंभ मेले का बदलता स्वरूप: आध्यात्म से अव्यवस्था तक की कहानी

भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक कुंभ मेला समय के साथ कई बदलावों से गुजरा है। जहां पहले यह आयोजन सादगी, तप और आध्यात्म का प्रतीक हुआ करता था, वहीं अब इसके स्वरूप में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यह चिंता हरिद्वार स्थित भूमा निकेतन के प्रबंधक राजेंद्र ने व्यक्त की है।

1980 के दशक का कुंभ: सादगी और साधना का संगम

राजेंद्र बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1980 में पहला कुंभ देखा था, जब वे प्रसिद्ध भूमा पीठाधीश्वर की सेवा में आए थे। उस समय आश्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी मिलने के साथ उन्होंने कुंभ मेले की व्यवस्था को करीब से समझा।उनके अनुसार, उस दौर में संतों के लिए सीमित स्थान होता था। सरकार छावनी के लिए जमीन उपलब्ध कराती थी, लेकिन संसाधन बहुत सीमित थे। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु भी सादगी के साथ इस आयोजन में भाग लेते थे।

रेत के टीलों पर मचान बनाकर संत तप, योग और साधना में लीन रहते थे। प्रवचन और धर्म प्रचार के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्म से जोड़ा जाता था। भव्यता भले कम थी, लेकिन आध्यात्मिक ऊर्जा प्रचुर मात्रा में महसूस होती थी।

देवरहा बाबा का मचान और संतों की परंपरा

राजेंद्र को वर्ष 1986 का कुंभ विशेष रूप से याद है, जब बैरागी कैंप से करीब दो किलोमीटर दूर देवरहा बाबा का मचान लगता था। वहां दूर-दूर से श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए पहुंचते थे। उस समय कुंभ का क्षेत्र सीमित था, लेकिन संतों की साधना और श्रद्धालुओं की आस्था इसे विशेष बनाती थी। आज के मुकाबले तब का कुंभ अधिक आध्यात्मिक और अनुशासित माना जाता है।

भूमि आवंटन और अतिक्रमण की समस्या

वर्तमान समय में कुंभ मेले का स्वरूप काफी विस्तृत हो चुका है। संतों और अखाड़ों को अलग-अलग स्थानों पर भूमि आवंटित की जाती है। लेकिन राजेंद्र के अनुसार, यह व्यवस्था अब समस्याओं का कारण बनती जा रही है।

उनका कहना है कि जिन अखाड़ों और संतों को भूमि दी गई, उन्होंने उसका संरक्षण नहीं किया। कई स्थानों पर स्थायी निर्माण हो गए हैं और अस्थायी व्यवस्था स्थायी ढांचों में बदल गई है। यहां तक कि कई जगहों पर भूमि का अप्रत्यक्ष रूप से क्रय-विक्रय भी हुआ है, जिससे धार्मिक स्थल व्यावसायिक रूप लेते जा रहे हैं।

सप्तऋषि क्षेत्र में बढ़ता अतिक्रमण

राजेंद्र बताते हैं कि पहले सप्तऋषि क्षेत्र में गंगा किनारा पूरी तरह खुला और प्राकृतिक था। लेकिन अब वहां बंधों और नदी के बीच फ्लैट और स्थायी निर्माण खड़े हो गए हैं। उनका आरोप है कि यह अतिक्रमण राजनीतिक संरक्षण में हुआ है। जिन स्थानों पर पहले कुंभ मेला लगता था, वहां अब बड़े-बड़े भवन और महल बन गए हैं।

प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल

इस स्थिति के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और उत्तराखंड शासन की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई, जिसके कारण धर्मनगरी का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। आज जिन स्थानों पर कभी धर्म और आध्यात्म का माहौल होता था, वहां अवैध कारोबार फल-फूल रहे हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि धार्मिक परंपराओं के लिए भी खतरा है।

संरक्षण की अपील

राजेंद्र ने शासन-प्रशासन के साथ-साथ संत समाज से भी अपील की है कि वे आगे आएं और इस पवित्र धर्मनगरी के स्वरूप को संरक्षित करें। उनका मानना है कि अगर इसी तरह विकास के नाम पर अव्यवस्थित निर्माण होता रहा, तो आने वाले समय में कुंभ मेले की व्यवस्था और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगी।

Watch Video

Watch the full video for more details on this story.

You Might Also Like

Facebook Feed