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चिपको आंदोलन की नायिका गौरा देवी: पेड़ों से चिपककर बचाया जंगल, भारत रत्न की मांग तेज

चिपको आंदोलन की नायिका गौरा देवी: जंगल बचाने की ऐतिहासिक गाथा

उत्तराखंड के रैणी गांव से शुरू हुआ चिपको आंदोलन आज भी पर्यावरण संरक्षण की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में गिना जाता है। सत्तर के दशक में जब देश में पर्यावरण को लेकर सख्त कानून नहीं थे और जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही थी, तब गौरा देवी ने महिलाओं के साथ मिलकर एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिसने इतिहास बदल दिया।

कैसे शुरू हुआ चिपको आंदोलन

26 मार्च 1973 का दिन भारतीय पर्यावरण इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उस दिन ठेकेदारों के मजदूर करीब 2500 पेड़ों को काटने के लिए रैणी गांव पहुंचे थे। संयोगवश उस समय गांव के पुरुष मुआवजे के लिए चमोली तहसील गए हुए थे।

जब मजदूर आरी और कुल्हाड़ी लेकर जंगल की ओर बढ़े, तो गांव की महिलाओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन मजदूरों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। ऐसे में गौरा देवी ने नेतृत्व संभाला और महिलाओं को संगठित किया।

पेड़ों से चिपककर किया विरोध

गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। वे पेड़ों से चिपक गईं और मजदूरों से कहा कि “पेड़ों को काटने से पहले हमें काटना होगा।” यह साहसिक कदम इतना प्रभावशाली था कि मजदूरों को पीछे हटना पड़ा। यह विरोध धीरे-धीरे एक बड़े जनांदोलन में बदल गया, जिसे बाद में चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया। इस आंदोलन ने न केवल जंगलों को बचाया बल्कि पूरे देश और दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

आज भी जिंदा है जंगल बचाने का जज्बा

रैणी गांव की महिलाएं आज भी उस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। गौरा देवी की सहेली ऊखा देवी, पौत्रवधु जूठी देवी, तुलसी देवी और उमा देवी का कहना है कि जंगल उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। उनके अनुसार, वन केवल लकड़ी का स्रोत नहीं बल्कि आजीविका, जल स्रोत और पर्यावरण संतुलन का आधार हैं। वे मानती हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगलों को बचाना उनकी जिम्मेदारी है।

गौरा देवी को भारत रत्न देने की मांग

अब गौरा देवी के योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग उठ रही है। गौरा देवी पर्यावरण एवं सामाजिक विकास समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा और संरक्षक पुष्कर सिंह राणा ने यह मांग उठाई है कि उनके ऐतिहासिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जानी चाहिए।

अधूरा पड़ा स्मारक

गौरा देवी की स्मृति में रैणी गांव में एक स्मारक का निर्माण भी प्रस्तावित है, लेकिन पर्याप्त बजट के अभाव में यह कार्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार को इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान आंदोलन और उसकी नायिका को याद रख सकें।

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