उत्तराखंड में वनाग्नि आंकड़ों पर सवाल: वेबसाइट से बदली समयावधि, जंगल में आग की घटनाएं कम दिखाने के आरोप
उत्तराखंड में वनाग्नि आंकड़ों पर उठे सवाल, वेबसाइट पर बदली समयावधि से कम दिख रही आग की घटनाएं
उत्तराखंड में फायर सीजन बढ़ने के साथ जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। पहाड़ों के जंगलों में धधकती आग जहां पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए खतरा बन रही है, वहीं अब वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि वन विभाग अपनी वेबसाइट पर वनाग्नि के आंकड़ों को इस तरह प्रस्तुत कर रहा है जिससे जंगल में आग की घटनाएं वास्तविक संख्या से कम दिखाई दें।
मामला सामने आने के बाद पारदर्शिता को लेकर वन विभाग की आलोचना शुरू हो गई है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आंकड़ों में बदलाव किया गया है तो यह गंभीर विषय है, क्योंकि इससे वनाग्नि की वास्तविक स्थिति छिप सकती है।
वेबसाइट पर बदली गई समयावधि
जानकारी के अनुसार, वन विभाग की वेबसाइट पर पहले वनाग्नि का डिवीजन वार ब्योरा 1 जनवरी 2026 से दिखाया जा रहा था। लेकिन मई महीने में वेबसाइट पर यह समयावधि बदलकर 15 फरवरी 2026 से कर दी गई।
इस बदलाव का सीधा असर वनाग्नि के कुल आंकड़ों पर पड़ा। जब डेटा की शुरुआती तारीख आगे बढ़ा दी गई तो जनवरी और फरवरी के शुरुआती दिनों में हुई आग की घटनाएं स्वतः रिकॉर्ड से बाहर हो गईं। इससे वेबसाइट पर दिख रही कुल घटनाओं की संख्या कम हो गई।
केदारनाथ वाइल्डलाइफ डिवीजन का मामला
वनाग्नि के आंकड़ों में अंतर का सबसे बड़ा उदाहरण केदारनाथ वाइल्डलाइफ डिवीजन में देखने को मिला। यह क्षेत्र कस्तूरी मृग और हिम तेंदुए जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास माना जाता है। पहले वेबसाइट पर 1 जनवरी से 20 अप्रैल 2026 तक इस डिवीजन में वनाग्नि की 48 घटनाएं दर्ज थीं। इन घटनाओं में करीब 23.01 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो गया था।
लेकिन समयावधि बदलने के बाद अब वेबसाइट पर 15 फरवरी से 7 मई तक केवल 21 वनाग्नि की घटनाएं दिखाई जा रही हैं। इन घटनाओं में 10.2 हेक्टेयर जंगल के नुकसान का आंकड़ा दर्ज है। इस बदलाव के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या विभाग आग की वास्तविक घटनाओं को कम दिखाने की कोशिश कर रहा है।
नंदा देवी नेशनल पार्क में भी आंकड़ों में बड़ा अंतर
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी नेशनल पार्क के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर देखने को मिला है।
पहले वेबसाइट पर 1 जनवरी से 20 अप्रैल तक वनाग्नि की 9 घटनाएं दर्ज थीं, जिनमें लगभग 24 हेक्टेयर जंगल जल गया था। लेकिन अब समयावधि बदलने के बाद वेबसाइट पर केवल एक घटना दिखाई जा रही है, जिसमें 2.5 हेक्टेयर जंगल के नुकसान की बात कही गई है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बदलाव से वास्तविक नुकसान की तस्वीर धुंधली हो सकती है और वन संरक्षण की नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।
जले हुए पेड़ों का डेटा भी हटाया गया
विवाद केवल वनाग्नि की घटनाओं की संख्या तक सीमित नहीं है। वन विभाग की वेबसाइट पर पहले जंगल की आग में जले हुए पेड़ों की संख्या का अलग कॉलम भी मौजूद था। लेकिन अब इस कॉलम को वेबसाइट से हटा दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़ों के नुकसान का डेटा हटाने से पर्यावरणीय प्रभाव का सही आकलन करना मुश्किल हो जाएगा। जंगलों में आग केवल भूमि को ही नहीं बल्कि हजारों पेड़ों, वनस्पतियों और वन्यजीवों को भी नुकसान पहुंचाती है।
वन विभाग ने क्या कहा?
इस मामले पर मुख्य वन संरक्षक (आपदा एवं वनाग्नि प्रबंधन) सुशांत पटनायक ने सफाई दी है। उनका कहना है कि वेबसाइट पर यह बदलाव सॉफ्टवेयर प्रबंधन करने वाली टीम की ओर से किया गया है।
हालांकि विभाग की इस सफाई से सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि यह केवल तकनीकी बदलाव था, तो इसके बारे में सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं दी गई।
बढ़ती वनाग्नि बना बड़ा खतरा
हर साल गर्मियों के दौरान उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं। सूखी पत्तियां, बढ़ता तापमान और मानव गतिविधियां वनाग्नि की बड़ी वजह मानी जाती हैं।
वनाग्नि का सबसे ज्यादा असर जैव विविधता पर पड़ता है। इससे न केवल पेड़-पौधे नष्ट होते हैं बल्कि कई दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होता है। इसके अलावा जंगलों में आग लगने से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और पर्यावरण संतुलन पर भी असर पड़ता है।
पारदर्शिता पर उठे सवाल
वन विभाग लंबे समय से वनाग्नि नियंत्रण और पारदर्शिता के दावे करता रहा है। लेकिन वेबसाइट पर आंकड़ों में बदलाव और कुछ महत्वपूर्ण डेटा हटाने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि वनाग्नि जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए सही और पारदर्शी आंकड़े बेहद जरूरी हैं। यदि डेटा में बदलाव कर वास्तविक स्थिति छिपाई जाती है, तो इससे न केवल नीति निर्माण प्रभावित होगा बल्कि जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ेगा।
अब देखना होगा कि वन विभाग इस विवाद पर आगे क्या कदम उठाता है और क्या वेबसाइट पर पुराने आंकड़े फिर से सार्वजनिक किए जाएंगे या नहीं।
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