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पश्चिम एशिया संकट पर मोदी सरकार सतर्क, उच्च स्तरीय बैठक में खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर फोकस

पश्चिम एशिया संकट पर मोदी सरकार अलर्ट, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर उच्च स्तरीय बैठक

पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच भारत सरकार पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गंभीर स्थिति की समीक्षा के लिए वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों के साथ एक अहम बैठक बुलाने का फैसला किया है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह उच्च स्तरीय बैठक प्रधानमंत्री के असम दौरे से लौटने के बाद आयोजित की जाएगी। बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के भारत पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना और आम नागरिकों को किसी भी तरह की असुविधा से बचाने के उपाय तय करना है।

बैठक में कौन-कौन होंगे शामिल

इस महत्वपूर्ण बैठक में देश के कई वरिष्ठ मंत्री शामिल होंगे, जिनमें रक्षा, गृह, विदेश और वित्त मंत्रालय के प्रमुख चेहरे शामिल हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, कैबिनेट सचिव और अन्य उच्च अधिकारी भी बैठक का हिस्सा होंगे। यह संकेत देता है कि सरकार इस मुद्दे को केवल कूटनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी गंभीरता से ले रही है।

ऊर्जा और ईंधन सुरक्षा पर खास फोकस

पश्चिम एशिया क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है, वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की चिंता बढ़ गई है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे आम जनता पर पड़ सकता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं।

खाद्य सुरक्षा भी बनी बड़ी चिंता

ऊर्जा के अलावा खाद्य सुरक्षा भी इस बैठक का एक अहम एजेंडा है। वैश्विक संकट के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है, जिससे खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। सरकार इस बात को सुनिश्चित करना चाहती है कि देश में खाद्य पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और आम लोगों को किसी तरह की कमी का सामना न करना पड़े।

पहले भी हो चुकी हैं अहम बैठकें

यह पहली बार नहीं है जब इस मुद्दे पर उच्च स्तरीय बैठक हो रही है। इससे पहले 22 मार्च और 12 मार्च को भी प्रधानमंत्री ने इसी समूह के साथ बैठक कर हालात की समीक्षा की थी। उन बैठकों में भी सरकार ने स्पष्ट किया था कि यह एक बदलती हुई स्थिति है और इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

सरकार ने सभी विभागों को मिलकर काम करने और स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखने के निर्देश दिए थे। साथ ही यह भी कहा गया था कि आम लोगों को कम से कम असुविधा हो, इसके लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे।

प्रधानमंत्री की अपील और चेतावनी

प्रधानमंत्री ने अपने हालिया संबोधन में इस संकट को “चुनौतीपूर्ण समय” बताया और देशवासियों से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे समय में अफवाह फैलाना या राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करना देशहित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय संकट नहीं बल्कि भारत के लिए भी एक परीक्षा का समय है, जिसका सामना शांति, धैर्य और जागरूकता से करना होगा।

भारत की कूटनीतिक सक्रियता

इस संकट के बीच भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रियता दिखाई है। प्रधानमंत्री ने कई देशों के नेताओं से बातचीत कर स्थिति को समझने और समाधान तलाशने की कोशिश की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत वैश्विक मंच पर भी अपनी भूमिका को मजबूती से निभा रहा है।

आगे क्या हो सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, आयात लागत में वृद्धि और महंगाई जैसे मुद्दे सामने आ सकते हैं।

हालांकि, सरकार की सक्रियता और समय पर लिए गए फैसले इस असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं। यही कारण है कि इस तरह की उच्च स्तरीय बैठकों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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