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बद्रीनाथ धाम में कपाट खुलने से पहले सेना के सांस्कृतिक कार्यक्रम पर विवाद, तीर्थ पुरोहितों ने जताई आपत्ति

बद्रीनाथ धाम में कपाट खुलने से पहले सेना के सांस्कृतिक कार्यक्रम पर विवाद

बद्रीनाथ धाम में कपाट खुलने से पहले आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय सेना द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम पर तीर्थ पुरोहितों और हक-हकूकधारियों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह आयोजन सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है।

क्या है पूरा मामला?

हर वर्ष सर्दियों के दौरान भगवान बद्री विशाल के कपाट लगभग छह महीने के लिए बंद रहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में देवता स्वयं भगवान की पूजा करते हैं और मनुष्यों द्वारा किसी भी प्रकार की पूजा या आयोजन नहीं किया जाता।

इसी बीच, कपाट खुलने से पहले बद्रीनाथ धाम परिसर में भारतीय सेना द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। जैसे ही यह जानकारी सामने आई, स्थानीय तीर्थ पुरोहितों और मंदिर से जुड़े अधिकारधारियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

पुरोहितों ने क्या कहा?

तीर्थ पुरोहित उमेश सती और पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल सहित कई लोगों ने इस आयोजन पर नाराजगी जताई। उनका कहना है कि कपाट बंद रहने की अवधि पूरी तरह धार्मिक और पवित्र मानी जाती है, जिसमें किसी भी प्रकार का सार्वजनिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि:

  • कपाट खुलने से पहले इस तरह का आयोजन पहली बार हुआ है
  • इससे धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का उल्लंघन हुआ है
  • इस कार्यक्रम के लिए अनुमति देने वालों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए

परंपराओं का महत्व

बद्रीनाथ धाम हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है और यहां की परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। कपाट खुलने के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है, जिसमें श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

पुरोहितों का कहना है कि इस विशेष अवसर के अलावा किसी भी अन्य समय पर इस तरह के आयोजन करना परंपराओं के विपरीत है।

प्रशासन और सेना की भूमिका

हालांकि इस पूरे मामले में प्रशासन या सेना की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि यह कार्यक्रम सांस्कृतिक और मनोबल बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया होगा।

फिर भी, स्थानीय धार्मिक समुदाय का कहना है कि किसी भी प्रकार का आयोजन करने से पहले परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

आगे क्या?

इस विवाद के बाद यह मांग उठ रही है कि भविष्य में इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन से पहले तीर्थ पुरोहितों और संबंधित पक्षों से परामर्श लिया जाए। साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि धार्मिक स्थलों की गरिमा और परंपराओं को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

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