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राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हुए बीसी खंडूड़ी, हरिद्वार में दी गई अंतिम विदाई

पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी का निधन, उत्तराखंड में शोक की लहर

भुवन चंद्र खंडूड़ी का मंगलवार को निधन हो गया। उत्तराखंड की राजनीति के सबसे सख्त, ईमानदार और अनुशासित नेताओं में गिने जाने वाले मेजर जनरल (सेनि) बीसी खंडूड़ी ने 92 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन से पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई है।

राज्य सरकार ने उनके सम्मान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। बुधवार को प्रदेश के सभी सरकारी कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में अवकाश घोषित किया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया शोक

द्रौपदी मुर्मु, नरेंद्र मोदी, लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह और पुष्कर सिंह धामी समेत कई बड़ी हस्तियों ने बीसी खंडूड़ी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।सीपी राधाकृष्णन भी बुधवार सुबह श्रद्धांजलि देने देहरादून पहुंचे। वह विशेष विमान से जौलीग्रांट एयरपोर्ट पहुंचे और वहां से सड़क मार्ग से बसंत विहार स्थित खंडूड़ी के आवास गए।

मैक्स अस्पताल में चल रहा था इलाज

बीसी खंडूड़ी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और मैक्स अस्पताल में भर्ती थे। बताया गया कि वह वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे।

उनके निधन के बाद पार्थिव शरीर को सेना की एंबुलेंस से सैन्य अस्पताल गढ़ीकैंट ले जाया गया। इसके बाद सैन्य सम्मान के साथ तिरंगे में लपेटकर उनके बसंत विहार स्थित आवास लाया गया।

नेताओं और समर्थकों ने दी श्रद्धांजलि

उनके आवास पर बड़ी संख्या में नेताओं, सामाजिक संगठनों और समर्थकों ने पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की।ऋतु भूषण खंडूड़ी, उनके बेटे मनीष खंडूड़ी, भाजपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सहित कई गणमान्य लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी छत्तीसगढ़ से लौटने के बाद सीधे उनके आवास पहुंचे और श्रद्धांजलि दी।

सेना में 36 साल तक दी सेवाएं

एक अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे बीसी खंडूड़ी ने राजनीति में आने से पहले भारतीय सेना में लंबी सेवा दी।वर्ष 1954 में वह सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेना में शामिल हुए और 1991 में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए।अपने 36 वर्षों के सैन्य करियर के दौरान उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 व 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी हिस्सा लिया।

अति विशिष्ट सेवा मेडल से हुए सम्मानित

सेना में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 1983 में अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था।सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।

पांच बार सांसद और दो बार मुख्यमंत्री रहे

बीसी खंडूड़ी पहली बार 1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद वह पांच बार लोकसभा पहुंचे।वह 2007-09 और 2011-12 में दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल सख्त प्रशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के लिए जाना जाता है।

सड़क क्रांति के प्रमुख वास्तुकार

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहते हुए बीसी खंडूड़ी ने देश में सड़क क्रांति की मजबूत नींव रखी।उनके नेतृत्व में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को गति मिली। दूरस्थ गांवों को सड़क नेटवर्क से जोड़ने में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।

अनुशासन और ईमानदारी की मिसाल

बीसी खंडूड़ी की पहचान एक सख्त, पारदर्शी और ईमानदार नेता के रूप में रही। उत्तराखंड में अफसरशाही पर नियंत्रण और विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर उनका रवैया बेहद कठोर माना जाता था।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में उनकी जगह भर पाना आसान नहीं होगा। उन्हें लंबे समय तक सुशासन और अनुशासन के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा।

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