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कपकोट में गर्भवती आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत के बाद हंगामा, पोस्टमार्टम में देरी पर ग्रामीणों ने लगाया जाम

कपकोट में गर्भवती आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत के बाद हंगामा, पोस्टमार्टम में देरी पर फूटा लोगों का गुस्सा

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र में एक गर्भवती आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। पोस्टमार्टम में कथित देरी को लेकर परिजनों और ग्रामीणों ने जिला अस्पताल के बाहर हंगामा करते हुए मुख्य सड़क पर चक्का जाम कर दिया। इस घटना के बाद इलाके में तनावपूर्ण माहौल बन गया।

गर्भवती आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की उपचार के दौरान मौत

जानकारी के अनुसार कपकोट के तिरवाण गांव निवासी 27 वर्षीय तनुजा देवी पत्नी मोहन चंद्र की अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। तनुजा देवी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थीं और वह दो से तीन माह की गर्भवती बताई जा रही थीं।

परिजनों के मुताबिक उन्हें अचानक तेज पेट दर्द की शिकायत हुई। प्राथमिक जानकारी में बताया गया कि गर्भ नली में भ्रूण फंस जाने के कारण उनकी स्थिति गंभीर हो गई थी। बताया जा रहा है कि इससे पहले उनका कोई अल्ट्रासाउंड या विस्तृत गर्भ संबंधी जांच नहीं कराई गई थी, जिसके कारण समय रहते समस्या का पता नहीं चल पाया।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल किया गया रेफर

बुधवार को तबीयत अधिक बिगड़ने पर परिजन उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कपकोट लेकर पहुंचे। वहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए जिला अस्पताल रेफर कर दिया।जिला अस्पताल पहुंचने के बाद इलाज शुरू किया गया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। तनुजा देवी अपने पीछे एक छोटे बेटे को छोड़ गई हैं। घटना के बाद परिवार में मातम पसरा हुआ है और गांव में शोक का माहौल बना हुआ है।

पोस्टमार्टम में देरी से भड़के ग्रामीण

महिला की मौत के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि बुधवार शाम लगभग छह बजे मौत होने के बावजूद गुरुवार दोपहर तक पोस्टमार्टम नहीं कराया गया।ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने दो बार जिला प्रशासन से संपर्क कर जल्द कार्रवाई की मांग की, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। करीब 18 घंटे तक प्रक्रिया पूरी न होने से लोगों में नाराजगी बढ़ती चली गई।

जिला अस्पताल के बाहर धरना और सड़क जाम

पोस्टमार्टम में हो रही देरी से नाराज ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने जिला अस्पताल के इमरजेंसी गेट के बाहर धरना शुरू कर दिया। इस दौरान मुख्य सड़क पर चक्का जाम भी किया गया, जिससे वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।प्रदर्शन कर रहे लोगों ने प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों का कहना था कि जब तक पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी नहीं होती और मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

मौके पर पहुंची पुलिस और प्रशासन की टीम

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोतवाली पुलिस और तहसील प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। कोतवाल अनिल उपाध्याय और जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. तपन शर्मा ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभालने का प्रयास किया।अधिकारियों ने परिजनों को समझाने की कोशिश की और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कराई। प्रशासन का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

इस घटना के बाद कपकोट और बागेश्वर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि समय पर जांच और बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलती तो शायद महिला की जान बचाई जा सकती थी। साथ ही जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम जैसी जरूरी प्रक्रिया में देरी ने प्रशासनिक कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

ग्रामीणों में भारी आक्रोश

घटना के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण अस्पताल परिसर में मौजूद रहे। प्रदर्शन में लक्ष्मी धर्मशक्तू, बसंती बघरी, आशु आर्या, सभासद गणेश तिरुवा, तनुज तिरुवा, दीपा देवी और गंगा आर्या समेत कई स्थानीय लोग शामिल रहे। ग्रामीणों ने मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं बनी चुनौती

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी लंबे समय से एक बड़ी समस्या बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित जांच, समय पर अल्ट्रासाउंड और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद जरूरी है।

लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव और संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण कई बार मरीजों को गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कपकोट की यह घटना भी पहाड़ी इलाकों की स्वास्थ्य चुनौतियों को एक बार फिर उजागर करती है।

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