सानिया राणा: चौबट्टाखाल की बेटी जिसने टैक्सी चलाकर पिता का सपना किया पूरा
चौबट्टाखाल: सानिया राणा ने टैक्सी चलाकर संभाली परिवार की जिम्मेदारी, पिता का सपना किया पूरा
उत्तराखंड के चौबट्टाखाल क्षेत्र के गिंवली गांव की रहने वाली सानिया राणा आज महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल बनकर सामने आई हैं। आमतौर पर टैक्सी चालक का पेशा पुरुषों से जुड़ा माना जाता है, लेकिन सानिया ने इस सोच को तोड़ते हुए टैक्सी चलाकर अपनी अलग पहचान बनाई है। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने न सिर्फ उनके काम को आगे बढ़ाया, बल्कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली।
सानिया राणा वर्तमान में चौबट्टाखाल स्थित राजकीय महाविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वह टैक्सी चलाकर अपने परिवार का सहारा बन रही हैं। उनके इस साहस और मेहनत ने पूरे इलाके में उन्हें एक प्रेरणादायक उदाहरण बना दिया है।
पिता से सीखी ड्राइविंग
सानिया बताती हैं कि एक समय वह कोटद्वार जाकर कंप्यूटर कोर्स करना चाहती थीं। जब उन्होंने यह बात अपने पिता कमलेश सिंह राणा से कही तो उन्होंने समझाया कि जब घर में ही रोजगार मौजूद है तो बाहर भटकने की जरूरत नहीं है। पिता की इस सलाह ने सानिया की सोच बदल दी।
कमलेश सिंह राणा खुद टैक्सी चलाते थे और चाहते थे कि उनका बेटा सुरेश ही नहीं बल्कि बेटी भी कार चलाना सीखे। पिता की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए सानिया ने उनसे ही ड्राइविंग सीखनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे उन्होंने गाड़ी चलाने में महारत हासिल कर ली।
जब सानिया 18 वर्ष की हुईं तो उन्होंने व्यावसायिक ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा लिया। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन यही हुनर उनके परिवार की जिंदगी को संभालने का सबसे बड़ा सहारा बन जाएगा।
पिता की बीमारी और परिवार पर आई मुश्किल
इस वर्ष 13 जनवरी को सानिया के पिता कमलेश सिंह राणा की गंभीर बीमारी का पता चला। अचानक आई इस खबर ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। इलाज के बावजूद 2 फरवरी को उनका निधन हो गया। पिता की मृत्यु के बाद परिवार गहरे दुख में डूब गया। घर की आर्थिक स्थिति भी कमजोर पड़ने लगी क्योंकि परिवार की आय का मुख्य साधन वही टैक्सी थी जिसे कमलेश सिंह राणा चलाते थे। ऐसे मुश्किल समय में सानिया ने हिम्मत दिखाई और फैसला किया कि वह पिता के काम को बंद नहीं होने देंगी।
पिता की तेरहवीं के बाद संभाला स्टेयरिंग
पिता की तेरहवीं के बाद सानिया ने बिना किसी डर और झिझक के उनकी कार का स्टेयरिंग संभाल लिया। पहाड़ी और सर्पिलाकार सड़कों पर टैक्सी चलाना आसान नहीं होता, लेकिन सानिया पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना काम करती हैं।
आज वह रोजाना चौबट्टाखाल, सतपुली और नौगांवखाल जैसे क्षेत्रों में सवारी लेकर जाती हैं। कई बार वह यात्रियों को कोटद्वार और देहरादून तक भी छोड़ने जाती हैं। उनकी मेहनत और लगन को देखकर स्थानीय लोग भी उनकी सराहना करते हैं। धीरे-धीरे लोग उन्हें एक भरोसेमंद टैक्सी चालक के रूप में पहचानने लगे हैं।
परिवार के लिए बनी मजबूत सहारा
सानिया के परिवार में उनकी मां, बड़ी बहन, बड़ा भाई और भाभी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए सानिया अपने भाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं।
उनके पिता ने टैक्सी के लिए एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी और बैंक से लोन लिया था। अब उस लोन की किस्त भी सानिया ही जमा कर रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाना आसान नहीं होता, लेकिन सानिया ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है।
समाज के लिए प्रेरणा
आज भी कई जगहों पर यह धारणा बनी हुई है कि टैक्सी चलाना या भारी वाहन चलाना महिलाओं का काम नहीं है। लेकिन सानिया राणा ने अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से इस सोच को गलत साबित कर दिया है। वह न सिर्फ अपने परिवार की मदद कर रही हैं बल्कि समाज में महिलाओं के लिए एक नई प्रेरणा भी बन रही हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी काम असंभव नहीं होता।
पिता का सपना किया पूरा
सानिया कहती हैं कि उनके पिता चाहते थे कि उनकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो और आत्मनिर्भर बने। आज टैक्सी चलाकर वह न सिर्फ अपने परिवार की जिम्मेदारी निभा रही हैं बल्कि अपने पिता के उस सपने को भी सच कर रही हैं।
उनकी यह कहानी सिर्फ एक लड़की की मेहनत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते।
सानिया राणा की यह संघर्ष और साहस की कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा इंसान को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। आज चौबट्टाखाल क्षेत्र की यह बेटी अपने साहस और मेहनत से नई मिसाल कायम कर रही है।
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