उत्तराखंड में बढ़ रही जंगल की आग की घटनाएं: 27 दिनों में 73 वनाग्नि, कुमाऊं में डेटा पर सवाल
उत्तराखंड में बढ़ रही जंगल की आग की घटनाएं, 27 दिनों में 73 वनाग्नि; कुमाऊं में डेटा पर सवाल
उत्तर भारत के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में इस साल जंगल की आग की घटनाएं तेजी से बढ़ती नजर आ रही हैं। फायर सीजन की शुरुआत होते ही प्रदेश के विभिन्न वन क्षेत्रों से लगातार वनाग्नि की खबरें सामने आ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार 15 फरवरी से 13 मार्च के बीच केवल 27 दिनों में ही 73 जंगल की आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन घटनाओं में कई हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है।
हालांकि, हैरानी की बात यह है कि वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर कुमाऊं क्षेत्र में आग की घटनाएं शून्य दिखाई जा रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कई जगहों पर आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इससे आंकड़ों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
सर्दियों में बारिश और बर्फबारी की कमी बनी वजह
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार सर्दियों में पर्याप्त बारिश और बर्फबारी नहीं होने के कारण जंगल काफी सूखे हो गए हैं। सूखी घास, पत्तियां और झाड़ियां जंगलों को अत्यधिक ज्वलनशील बना देती हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे जंगल में आग लगने की आशंका भी बढ़ जाती है। इसी कारण फरवरी के बाद से आग की घटनाओं में तेजी देखने को मिल रही है। गर्म और शुष्क मौसम वनाग्नि के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा करता है।
नवंबर 2025 से फरवरी तक 61 घटनाएं
वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 तक प्रदेश में जंगल की आग की 61 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इन घटनाओं में लगभग 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ था। लेकिन 15 फरवरी के बाद आग की घटनाओं में अचानक तेजी आई। अगले 27 दिनों में ही 73 नई घटनाएं सामने आ गईं, जिससे वन विभाग की चिंता और बढ़ गई है।
गढ़वाल क्षेत्र में सबसे अधिक घटनाएं
15 फरवरी से 13 मार्च के बीच हुई 73 घटनाओं में से अधिकांश गढ़वाल क्षेत्र में दर्ज की गई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 70 घटनाएं गढ़वाल क्षेत्र में और तीन घटनाएं वन्यजीव क्षेत्रों में हुई हैं। इन घटनाओं में 36 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। जंगलों में आग लगने से न केवल वन संपदा को नुकसान होता है, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी यह बड़ा खतरा बन जाता है।
कुमाऊं में वेबसाइट पर शून्य आंकड़े
वन विभाग की वेबसाइट के अनुसार कुमाऊं क्षेत्र में नवंबर के बाद से मार्च तक जंगल की आग की कोई भी घटना दर्ज नहीं की गई है। वेबसाइट पर कुमाऊं रीजन में वनाग्नि की संख्या शून्य दिखाई जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। स्थानीय स्तर पर कई जगहों पर जंगल में आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे सवाल उठ रहा है कि क्या सभी घटनाओं का डेटा वेबसाइट पर अपडेट नहीं किया जा रहा है।
अल्मोड़ा के मटेला जंगल में लगी आग
हाल ही में 12 मार्च को अल्मोड़ा जिले के मटेला के जंगल में आग लगने की घटना सामने आई थी। आग लगने की सूचना मिलने के बाद दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची और काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया। इस घटना के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया कि यदि ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो फिर विभागीय वेबसाइट पर उनका रिकॉर्ड क्यों नहीं दिख रहा है।
वनाग्नि से पर्यावरण और वन्यजीवों को खतरा
जंगल की आग का सबसे बड़ा असर पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ता है। आग लगने से जंगलों की जैव विविधता को भारी नुकसान होता है। कई छोटे जीव-जंतु और पक्षी आग की चपेट में आ जाते हैं। इसके अलावा जंगल की आग से वातावरण में बड़ी मात्रा में धुआं और कार्बन उत्सर्जन होता है, जिससे वायु प्रदूषण भी बढ़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
रोकथाम के लिए सतर्कता जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल की आग को रोकने के लिए समय रहते सतर्कता जरूरी है। वन विभाग को संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ानी चाहिए और स्थानीय लोगों को भी जागरूक करना चाहिए। साथ ही जंगलों में सूखी पत्तियों और घास को नियंत्रित तरीके से हटाने, फायर लाइन बनाने और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करने जैसे कदम भी जरूरी हैं।
गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं आमतौर पर बढ़ जाती हैं। ऐसे में समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाएं तो वन संपदा और पर्यावरण को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
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