केदारनाथ रावल नियुक्ति विवाद गहराया: उत्तराधिकारी घोषित करने पर उठे सवाल, शिष्यों ने परंपरा और नियमों का हवाला देकर जताई आपत्ति
केदारनाथ रावल नियुक्ति विवाद गहराया, उत्तराधिकारी घोषित करने पर उठे सवाल; शिष्यों ने परंपरा और नियमों का दिया हवाला
रुद्रप्रयाग/केदारनाथ। उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम में रावल नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और गहराता नजर आ रहा है। फरवरी 2026 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित एक धार्मिक समारोह के दौरान केदारनाथ धाम के मुख्य रावल भीमाशंकर लिंग शंकराचार्य द्वारा अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग महाराज को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद इस फैसले पर सवाल उठने लगे हैं।
अब मुख्य रावल के दो अन्य शिष्यों ने सामने आकर इस नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनका कहना है कि यह निर्णय परंपराओं, धार्मिक व्यवस्थाओं और बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) की नियमावली के अनुरूप नहीं है।
नांदेड़ में हुआ था पट्टाभिषेक समारोह
फरवरी 2026 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित पट्टाभिषेक समारोह में मुख्य रावल भीमाशंकर लिंग शंकराचार्य ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग महाराज को उत्तराधिकारी घोषित किया था। इस समारोह की सबसे चर्चित बात यह रही कि बाबा केदार की रूपछड़ को भी कार्यक्रम में ले जाया गया। आरोप है कि BKTC की नियमावली के अनुसार ऐसा किया जाना निर्धारित परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जाता।इसी घटना के बाद रावल पद के उत्तराधिकार को लेकर धार्मिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस शुरू हो गई।
क्या है केदारनाथ रावल बनने की परंपरागत प्रक्रिया?
रावल पद को लेकर उठे विवाद के बीच परंपरागत नियमों की चर्चा भी तेज हो गई है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार केदारनाथ का रावल बनने के लिए कुछ विशेष योग्यताएं निर्धारित हैं।
पहली योग्यता
रावल बनने वाला व्यक्ति कर्नाटक के वीरशैव या लिंगायत समुदाय से संबंधित ब्राह्मण होना चाहिए।
दूसरी योग्यता
उसे वर्तमान या पूर्व रावल का दीक्षित शिष्य होना चाहिए तथा केदारनाथ, मध्यमहेश्वर, गुप्तकाशी और ऊखीमठ स्थित मंदिरों की पूजा पद्धति और धार्मिक परंपराओं का अनुभव होना आवश्यक है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण योग्यता
रावल पद के लिए पात्र शिष्यों में से वरिष्ठता, धार्मिक ज्ञान और शास्त्रीय योग्यता के आधार पर केवल बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) ही नियुक्ति कर सकती है।धार्मिक जानकारों के अनुसार रावल का पद आजीवन होता है और इसका कोई निर्धारित कार्यकाल नहीं होता। केवल निधन या विधिवत त्यागपत्र की स्थिति में ही नए रावल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है।
शिष्यों ने नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल
मुख्य रावल के दो अन्य शिष्य पंडिताराध्य शिवाचार्य और शांतवीर शिवाचार्य हिरेमठ ने इस पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।उन्होंने कहा कि वे स्वयं भी सभी पारंपरिक योग्यताओं को पूरा करते हैं और केदारनाथ समूह के मंदिरों में पूजा-अर्चना का अनुभव रखते हैं। उनके अनुसार यदि भविष्य में रावल पद रिक्त होता है तो सभी पात्र शिष्यों के बीच परंपरा के अनुरूप चयन प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।उनका कहना है कि वर्तमान में रावल पद रिक्त नहीं है, इसलिए किसी को उत्तराधिकारी घोषित करना नियमों और परंपराओं के विरुद्ध माना जाना चाहिए।
‘325वें रावल’ के प्रचार पर भी जताई आपत्ति
शिष्यों ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शिवाचार्य शांति लिंग महाराज को “केदारनाथ के 325वें रावल” अथवा “उत्तराधिकारी रावल” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि जब तक वर्तमान रावल पद पर बने हुए हैं और उनका त्यागपत्र स्वीकार नहीं होता या पद रिक्त नहीं होता, तब तक किसी भी व्यक्ति को भविष्य के रावल के रूप में प्रस्तुत करना श्रद्धालुओं के बीच भ्रम पैदा कर सकता है।उनका यह भी कहना है कि ऐसी गतिविधियां भविष्य की नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास मानी जा सकती हैं।
रावल पद का धार्मिक महत्व
केदारनाथ धाम में रावल का पद केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक पद माना जाता है।रावल को गुरु स्थान प्राप्त होता है और उनके अधीन पांच दीक्षित शिष्य विभिन्न मंदिरों में पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाते हैं। इनमें केदारनाथ, मध्यमहेश्वर, गुप्तकाशी और ऊखीमठ स्थित मंदिर शामिल हैं।सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि केदारनाथ के रावल और पुजारी दक्षिण भारत के वीरशैव लिंगायत जंगम परिवारों से चुने जाते हैं।
उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों के अनुसार केदारनाथ धाम की यह परंपरा उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों की एक अनूठी मिसाल है।गढ़वाल के इतिहास से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग शंकराचार्य को 324वां रावल माना जाता है। वहीं ऊखीमठ को वीरशैव लिंगायत परंपरा की महत्वपूर्ण पीठों में से एक माना जाता है।करोड़ों वीरशैव लिंगायत श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
BKTC ने मांगा था जवाब
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि हेमंत द्विवेदी की अध्यक्षता वाली बदरी-केदार मंदिर समिति ने फरवरी 2026 में ही इस विषय पर मुख्य रावल से स्पष्टीकरण मांगा था।समिति की ओर से जारी नोटिस में उत्तराधिकारी घोषित करने और पट्टाभिषेक कार्यक्रम को लेकर जवाब तलब किया गया था। हालांकि समिति के अनुसार अब तक इस नोटिस का आधिकारिक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है।
क्या आगे बढ़ सकता है विवाद?
धार्मिक परंपराओं, मंदिर समिति की नियमावली और उत्तराधिकारी घोषित किए जाने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के कारण यह विवाद आने वाले समय में और गहरा सकता है।फिलहाल मुख्य रावल पद पर भीमाशंकर लिंग शंकराचार्य ही कार्यरत हैं और बदरी-केदार मंदिर समिति की ओर से भी कोई नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है। ऐसे में श्रद्धालुओं और धार्मिक समुदाय की नजरें अब BKTC के अगले कदम और इस मामले में आने वाले आधिकारिक निर्णय पर टिकी हुई हैं।
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