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मेरठ CMO दफ़्तर में 'कमीशन कांड': 15% घूस के पीछे कौन, कब होगी भ्रष्टाचारियों की 'गुपचुप संपत्ति' की जांच?

मेरठ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय में मदर केयर कीट टेंडर पर एसीएमओ महेश चंद्र और चीफ फार्मासिस्ट यदुवीर सिंह द्वारा 15% कमीशन मांगने का मामला सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जहां एक ओर सरकार भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का दावा करती है, वहीं इन अधिकारियों की कथित 'खामोशी' और 'बेखौफी' सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करती है।

1. कौन देता है कमीशनखोरों को संरक्षण? क्यों नहीं है इन्हें किसी का डर?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एसीएमओ और सीएमओ जैसे उच्च पदस्थ अधिकारी इतने बड़े घूस के खेल को चलाने की हिम्मत कहां से जुटाते हैं?

क्या यह सिस्टम का सपोर्ट है? क्या यह 15% कमीशन केवल दो अधिकारियों तक सीमित है, या यह रकम ऊपर तक साझा की जाती है? अधिकारी बिना किसी खौफ के कैमरे के सामने कमीशन मांग रहे हैं—यह दर्शाता है कि उन्हें लगता है कि उनकी पहुंच मजबूत है और कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता।

खबर के बाद भी चुप्पी क्यों? घटना का खुलासा होने के बावजूद, एसीएमओ और सीएमओ ने अपना कोई पक्ष क्यों नहीं रखा है? उनकी यह खामोशी भ्रष्टाचार में लिप्त होने का संकेत देती है। योगी सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के बावजूद, इन अधिकारियों को किसी कार्रवाई का डर क्यों नहीं है?

कमीशन की कीमत, जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा?

टेंडर के रनिंग बिल्स पर 15% कमीशन की मांग का सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। जब 15 लाख रुपए के टेंडर में से लगभग सवा दो लाख रुपए रिश्वत में चले जाएंगे, तो मदर केयर किट की गुणवत्ता क्या होगी?

घटती गुणवत्ता: कमीशन की भरपाई करने के लिए, ठेकेदार निश्चित तौर पर किट में इस्तेमाल होने वाले सामान की गुणवत्ता से समझौता करेंगे।

खतरे में जन स्वास्थ्य: ये किटें नवजात शिशुओं और उनकी माताओं के लिए होती हैं। घटिया सामग्री से बनी किटें उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। मेरठ की चिकित्सा व्यवस्था पहले से ही सवालों के घेरे में रही है; इस तरह के भ्रष्टाचार से आम जनता को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत और भी बदतर हो जाएगी।

योगी सरकार की ईमानदारी की परीक्षा: क्या सिर्फ 'नारा' है जीरो टॉलरेंस?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बात करती है। मेरठ का यह मामला अब सीधे तौर पर सरकार की नीति की परीक्षा है।

सिर्फ बर्खास्तगी काफी नहीं: कमीशन मांगने वाले इन अधिकारियों को तत्काल निलंबित कर बर्खास्त करना आवश्यक है। लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं है।

आय से अधिक संपत्ति की जांच हो: यह साफ है कि कमीशनखोरी का यह धंधा वर्षों से चल रहा होगा। एसीएमओ, चीफ फार्मासिस्ट और इसमें शामिल अन्य अधिकारियों की अघोषित संपत्ति (Undisclosed Properties) और बैंक खातों की गहन जांच होनी चाहिए। यह जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) या सतर्कता विभाग द्वारा होनी चाहिए ताकि जनता का पैसा हड़पने वाले ऐसे लोगों की सालों की लूट का खुलासा हो सके।

योगी सरकार को इस मामले में नजीर पेश करते हुए यह साबित करना होगा कि उनका 'जीरो टॉलरेंस' का नारा केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि एक सख्त प्रशासनिक सच्चाई है।

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